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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१४ किया। इस कार्य मे उसके दो अन्य पुत्र पामा और बलराज भी उसके सहायक थे। राणा कुम्भा के अन्य प्रसिद्ध राजकीय स्थपति सूत्रधार मण्डन हुए। वे संस्कृत भाषा के भी अच्छे विद्वान् थे। उन्होंने निम्न लिखित शिल्प ग्रन्थो की सस्कृत मे रचना की— प्रासाद मण्डन, वास्तु मण्डन, रूप मण्डन, राज-वल्लभ मण्डन, देवता मूर्ति प्रकरण, रूपावतार, वास्तुसार, वास्तु-शास्त्र। राजवल्लभ ग्रन्थ मे उन्होंने अपने संरक्षक सम्राट् राणा कुम्भा का इस प्रकार गौरव के साथ उल्लेख किया है— "श्रीमेदपाटे नृपकुम्भकर्ण—स्तदंघ्रिराजीवपरागसेवी । समण्डनाख्यो भुवि सूत्रधारस्तेनोद्ध तो भूपतिवल्लभोऽयम् ।” (१४—४३) रूपमण्डन ग्रन्थ मे सूत्रधार मण्डन ने अपने विषय मे लिखा है— “श्रीमद्दे शे मेदपाटाभिधाने क्षेत्राख्योऽभूत् सूत्रधारो वरिष्ठ । पुत्रो ज्येष्ठो मण्डनस्तस्य तेन प्रोक्तं शास्त्रं मण्डन रूपपूर्वम् ।” (६—४०) इससे ज्ञान होता है कि मण्डन के पिता का नाम सूत्रधार क्षेत्र था। इन्हे ही अन्य लेखों मे क्षेत्राक भी कहा गया है। क्षेत्राक का एक दूसरा पुत्र सूत्रधार नाथ भी था जिसने 'वास्तु मंजरी' नामक ग्रन्थ की रचना की। सूत्रधार मण्डन का ज्येष्ठ पुत्र सूत्रधार गोविन्द और छोटा पुत्र सूत्रधार ईश्वर था। सूत्रधार गोविन्द ने तीन ग्रन्थो की रचना की—उद्धार धोरणि, कलानिधि और द्वारदीपिका। कलानिधि ग्रन्थ मे उसने अपने विषय मे और अपने संरक्षक राणा श्री राजमल्ल (रायमल्ल) के विषय मे लिखा है— “सूत्रधारः सदाचारः कलाधारः कलानिधिः । दण्डाधार. सुरागार. श्रिये गोविन्दयादिशत् ॥ राज्ञा श्री राजमल्ले (न) प्रीतस्यामि (ति) मनोहरे । प्रणम्यमाने प्रासादे गोविन्द. संव्यधादिदम् ।” (विक्र, सं. १५५४) राणा कुंभा की पुत्री रमा बाई का एक लेख (विक्रम सं. १५५४) जावर से प्राप्त हुआ है जिसमे क्षेत्राक के पौत्र और सूत्रधार मण्डन के पुत्र ईश्वर ने 'कमठाणा बनाने का उल्लेख है— "श्रीमेदपाटे वरे देणे कुम्भकर्णनृपगृहे क्षेत्राकसूत्रधारस्य पुत्रो मण्डन आत्मवान् सूत्रधारमण्डन सुत ईशरए कमठाणु विरचितं ।” ईश्वर ने जावर मे विष्णु के मन्दिर का निर्माण किया था। इसी ईश्वर का पुत्र सूत्रधार छीतर था जिनका उल्लेख विक्रम सं. १५५६ (१४६६ ई.) के चित्तौड़ से प्राप्त एक लेख मे आयो है। यह राणा राय- १—गृह और देवालय आदि इमारती काम को अभी भी राजस्थानीय शिल्पी 'कमठाणा' बोलते है।

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