भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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११२ प्रासादमण्डने द्राविड प्रासाद— पीठोपरि भवेद् वेदी पीठानि त्रीणि पञ्च वा । पीठतो द्राविडे रेखा लताशृङ्गादिसंयुता ॥२८॥ द्राविड प्रासाद को पादबंधनादि तीन अथवा पांच पीठ हैं, इस पीठ के ऊपर वेदी होती है। तथा उसको रेखा (कोना) लता और शृंगों वाली होती है ॥२८॥ भूमिजप्रासाद— भूमिकोपरिभूमिश्च १ह्रस्वा ह्रस्त्रा नवान्तकम् । विभक्तदलसंयुक्ता मूर्ध्नि शृङ्गेण भूमिजाः ॥२६॥ भूमिज जाति के प्रासाद एक के ऊपर एक ऐसे नव भूमि (माल) तक बनाया जाता है। उसमें नीचे के मालसे ऊपर का माल छोटा २ किया जाता है। पदविभक्ति वाला और ऊपर शृंग वाला भूमिज प्रासाद है ॥२६॥ लतिन श्रीवत्स और नागर जातिके प्रासाद— शृङ्गेणैकेन लतिनाः श्रीवत्सा२ वारिसंयुताः । नागरा भ्रमसंयुक्ताः सान्धारास्ते प्रकीर्तिताः ॥३०॥ इति प्रासादजातय । लतिन जाति के प्रासाद एक शृंग वाले है, श्रोवत्स प्रासाद वारि मार्ग वाले हैं। नागर प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाले है, उसको सांधार प्रासाद कहते है ॥३०॥ मेरुप्रासाद — पञ्चहस्तो भवेन्मेरु–रेकोत्तरशताण्डकः । भेदाः पञ्चोनपञ्चाशत् करवृद्ध्या भवन्ति ते ॥३१॥ हस्ते हस्ते भवेद् वृद्धि–स्त्वण्डकानां च विंशतिः । एकोत्तरसहस्रं स्या–च्छृङ्गाणां च शताद्धिके ॥३२॥ मेरु प्रासाद पांच हाथ से न्यून नहीं बनाया जाता । पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के ऊपर एकसौ एक शृंग चढ़ाये जाते है। यह पांच हाथ से एक २ हाथ पचास हाथ तक बढ़ाने से पैंतालीस भेद होते है। बढ़ाये हुए प्रत्येक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ऊपर १. 'ह्रस्वावर्कनवान्तकम्'. इति पाठान्तरे । २. 'श्रीवत्साम्बुपथान्विताः।' ३. यहा पञ्चाडी नवांडी आदि चार२ क्रम समझने का है ।