प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• १५२ प्रासादमण्डने बृहद्हलैर्भिन्नोद्भिन्ना मण्डपक्रमभागतः । आसां युक्तिर्विधातव्या मेरूकूटान्तकल्पना ॥ तवंग और कूटके मध्य में दो भाग के विस्तारवाला और एक भाग के उदय वाला तलके भूषणरूप तिलक बनावें । तवंगा और रथिका ये दोनों दो भाग के उदयवाले बनावें । अड़तालीस कूटा, नवघण्टा और बारह सिंह वाली नन्दिनी नाम की संवरणा शांति की इच्छा रखने वाले बनावें। समचोरस क्षेत्र के भागों में तिलककी वृद्धि करनी चाहिये । मंडप को विस्तार से आधा उदय में रखें। भूमि के बारह भाग की कल्पना करे। संवरणायें भिन्न और उद्भिन्न [चित्र-शीर्षक: १३ वामी सैन्यधी की पुरानी संवारणी वल्लभी-शैली] [पुरातत्त्व प्रो. सांकलि.] होती हैं। मण्डप के अनुक्रम भाग से पचीसवीं मेरुकूटा नाम की संवरणा तक इस प्रकार युक्ति से अन्य संवरणायें बनावें । इति श्री मंडनसूत्र धार विरचित प्रासादमंडन के मंडप बलाणक संव- रणा लक्षणवाला सातवां अध्याय की पंडित भगवानदास जैन ने सुबोधिनी नाम की भाषा टीका रची ॥७॥ ★