प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ प्रासादमण्डने शिवालय उत्थापनदोष— स्वस्थाने संस्थितं यस्य विप्रवास्तुशिवालयम् । अचाल्यं सर्वदेशेषु चालिते राष्ट्रविभ्रमः ॥५॥ अपने स्थान मे यथास्थित रहा हुआ और ब्राह्मणों से वास्तु पूजन किया हुआ, ऐसे शिवालय को चलायमान नही किया जाता । क्योंकि अचल ( चलायमान न हो ), को यदि चलायमान किया जाय तो राष्ट्रों मे परिवर्त्तन होता है ॥५॥ जीर्णोद्धार का पुण्य— वापीकूपतडागानि प्रासादभवनानि च । जीर्णान्युद्धरते यस्तु पुण्यमष्टगुणं लभेत् ॥६॥ वावडी, कुआं, तालाब, प्रासाद ( मंदिर ) और भवन, ये जीर्ण हो गये हों तो उनका उद्धार करना चाहिये । जीर्णोद्धार करने से आठ गुना फल होता है ॥६॥ जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप— तद्रूपं तत्प्रमाणं स्यात् पूर्वसूत्रं न चालयेत् । हीने तु जायते हानि-रधिके स्वजनक्षयः' ॥७॥ जीर्णोद्धार करते समय पहले का वास्तु जिस आकार और जिस मानका हो, उसी आकार और उसी मानका रखना चाहिये । अर्थात् पहले के मानसूत्र मे परिवर्त्तन नही करना चाहिये । प्रथम के मान से कम करे तो हानि होवे और अधिक करे तो स्वजन की हानि होवे ॥७॥ वास्तु द्रव्याधिकं कुर्यान्मृत्काष्ठे शैलजं हि वा । शैलजे धातुजं वापि धातुजे रत्नजं तथा ॥८॥ जीर्णोद्धार करते समय प्रथम का वास्तु अल्पद्रव्य का हो तो वह अधिक द्रव्यका बनाना चाहिये । जैसे—प्रथमका वास्तु मिट्टी का हो तो काष्ठ का, काष्ठ का हो तो पाषाण का, पाषाण का हो तो धातु का और धातु का हो तो रत्न का बनाना श्रेयस्कर है ॥८॥ दिङ्मूढ दोष— पूर्वोत्तरदिशामूढं मूढं पश्चिमदक्षिणे । तत्र मूढममूढं वा यत्र तीर्थं समाहितम् ॥६॥ १. 'तु धनक्षयः ।'