प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १६१ सर्वेषां धनमाधारः प्राणीनां जीवनं परम् । वित्ते दत्ते प्रतुष्यन्ति मनुष्याः पितरः सुराः ॥८७ ॥८७॥ इति प्रतिष्ठाविधिः । प्रतिष्ठाका कार्य समाप्त होने के बाद वस्त्र और सुवर्ण आदि धन से आचार्य की पूजा करें। पीछे ब्राह्मणों को तथा दीन, अंध और दुर्बल मनुष्यों को दान देवे । क्योकि सब प्राणियों का आधार धन है, और यही प्राणियो का श्रेष्ठ जीवन है। धन का दान देने से मनुष्य, पितृदेव और अन्य देव संतुष्ट होते हे ॥८६-८७॥ जिनदेव प्रतिष्ठा— प्रतिष्ठा वीतरागस्य जिनशासनमार्गतः । नवकारैः सूरिमंत्रैश्च सिद्धकेवलिभाषितैः ॥८८॥ वीतराग देव की प्रतिष्ठा जैन शासन मे बतलाई हुई विधि के अनुसार, सिद्ध हुए केवल- ज्ञानियो ने कहे हुए नवकारमंत्र और सूरिमंत्रो के उच्चारण पूर्वक करनी चाहिये ॥८८॥ ग्रहाः सर्वज्ञदेवस्य पादपीठे प्रतिष्ठिताः । येनानन्तविभेदेन मुक्तिमार्ग उदाहृताः ॥८६॥ जिनानां मातरो यक्षा यक्षिण्यो गौतमादयः । सिद्धाः कालत्रये जाताश्चतुर्विंशतिमूर्त्तयः ॥६०॥ सर्वज्ञदेव के पादपीठ ( पवासन ) मे नवग्रह स्थापित करे । ये जिनदेव अनन्त भेदो से मुक्ति मार्ग के अनुगामी कहे गये है । जिनदेव की माता, यक्ष, यक्षिणी और गौतम आदि गणधर आदि की मूर्त्तिया, तथा तीन काल मे सिद्ध होनेवाले चौवीस २ जिनदेव की मूर्त्तियां है ॥८६-६०॥ इति स्थाप्या जिनावासे त्रिप्राकारं गृहं तथा । सांवर्णं शिखरं १मन्दा-रकं त्वष्टापदादिकम् ॥६१॥ वे मूर्त्तिया जिनालय मे स्थापित करे । जिनालय समवसरण वाला, सवरणा वाला, शिखर वाला, गुम्बद वाला और अष्टापद वाला बनाया जाता है ॥६१॥ १. 'मन्दोश्वर ।' श० २१