भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

१७० प्रासादमण्डने क्षेत्रार्धे च भवेद् भद्रं भद्रार्धं कर्णविस्तरः । कर्णस्यार्धप्रमाणेन कर्त्तव्यो भद्रनिर्गमः ॥१२१॥ प्रासाद की भूमिके नाप से आधा भद्रका विस्तार रक्खें। इससे आधे मानका कोणा का विस्तार रक्खें। कोणे के आधे मान का भद्रका निर्गम रक्खें ॥१२१॥ चतुष्कर्णेषु ख्यातानि श्रीवत्सशिखराणि च । रथिकोद्गमे च पञ्चैव केशरी गिरिजाप्रियः ॥१२२॥ इति केसरीप्रासादः ॥१॥ प्रासाद के चारों कोणे के ऊपर एक २ श्रीवत्स शृंग चढावें, तथा भद्रके ऊपर रथिका और उद्गम बनावें। इस प्रकार का केसरी नामका प्रासाद पार्वती देवी को प्रिय है ॥१२२॥ शृंग संख्या-चार कोणे ४ और एक शिखर एवं कुल ५ शृंग। २-सर्वतोभद्रप्रासाद— क्षेत्रे विभक्ते दशधा गर्भः षोडशकोष्ठकैः । भित्तिं भ्रमं च भित्तिं च भागभागं प्रकल्पयेत् ॥१२३॥ प्रासाद की समचोर भूमिका दस २ भाग करें। उनमें से मध्य गभारा कुल सोलह भाग का रक्खें। बाकी एक भाग की दीवार, एक भाग की भ्रमणी और एक भागकी दूसरी बाहर की दीवार रक्खें ॥१२३॥ द्विभागः कर्ण इत्युक्तो भद्रं षड्भागिकं तथा । निर्गमं चैकभागेन भागिका पार्श्वचोभयोः ॥१२४॥ दो २ भाग का कोणा और छभागका भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की एक २ कोणी बनावें ॥१२४॥ कर्णिका चार्धभागेन भागार्धं भद्रनिर्गमम् । भागत्रयं च विस्तारे मुखभद्रं विधीयते ॥१२५॥ भद्र के दोनों तरफ आधे २ भाग की एक २ कर्णिका भी बनाना—इस का और कोणीया का निर्गम आधा भाग और भद्र का निर्गम आधा भाग, इस प्रकार कुल एक भाग भद्र का निर्गम जानें। भद्रका विस्तार छ भाग रखना ऊपर लिखा है, उनमे से दो कोणी और


चित्र-संलग्न पाठ (चित्र शीर्षक एवं विवरण):

  • ऊर्ध्व पाठ (चित्र के पार्श्व में): 〔उत्तार्द्धे, केसरी प्रासाद ११, समराङ्गण, पृ. ३६५, रेखा ५〕
  • तलच्छन्द (Ground Plan) पाठ: केसरीप्रासादप्रस्तारः (अन्तर्गत: भित्ति, गर्भ)