भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१७८ प्रासादमण्डने कर्णे द्विशृङ्गं तिलकं शिखरं सूर्यविस्तरम् । तिलके द्वे नन्दिकायां प्रत्यङ्गं तु द्विभागिकम् ॥४२॥ शृङ्गत्रयं प्रतिरथे षड्भागा चोरुमञ्जरी । तिलके द्वे पुनर्नन्द्यां-मुरुशृङ्गं युगांशकम् ॥४३॥ नन्द्यां च शृङ्गतिलके त्रिभागा चोरुमञ्जरी । द्विभागं भद्रशृङ्गं च अर्धे चार्धे च निर्गमः ॥४४॥ कोणे के ऊपर दो शृंग और एक तिलक चढ़ावे । शिखर का विस्तार बारह भाग का रक्खें । कर्णानन्दो के ऊपर दो तिलक और दो भाग का प्रत्यंग चढ़ावे । प्रतिरथ के ऊपर तीन शृंग और नंदी के ऊपर दो तिलक चढ़ावें । भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक चढ़ावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग चढ़ावें, उनमे पहला उरुशृंग छः भाग, दूसरा चार भाग, तीसरा तीन भाग और चौथा दो भाग का रक्खे । ये उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा रक्खे ॥४२ से ४४॥ शृंग संख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ६५ शृंग और तिलक—कोणे ४, कोणो पर १६, प्ररथ नन्दी पर १६ और भद्र नन्दी पर ८, कुल ४४ तिलक । रत्नकूटस्तदा नाम शिवलिङ्गेषु कामदः । प्रशस्तः सर्वदेवेषु राज्ञां तु जयकारणम् ॥४५॥ इति रत्नकूटप्रासादः ॥१६॥ ऊपर कहे हुए स्वरूप वाला रत्नकूट प्रासाद शिवलिंग के लिये बनावें तो सब इच्छित फल को देने वाला है । सब देवो के लिये बनावे तो भी प्रशस्त है और राजाओं को विजय कराने वाला है ॥४५॥ १७—वैडूर्यप्रासाद— शृङ्गं तृतीयं रेखोर्ध्वे कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् । वैडूर्यश्च तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥४६॥ इति वैडूर्यप्रासादः ॥१७॥ इस प्रासाद का तलमान और स्वरूप रत्नकूट प्रासाद के अनुसार है । विशेष यह है कि—कोणे के ऊपर से तिलक निकाल करके उसके बदले एक तीसरा शृंग चढ़ावें । सब