प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्टे केसरीप्रासादः १८३ २५-मेरुप्रासाद— कर्णे शृङ्गत्रयं चैव एकोत्तरशताण्डकः । मेरुश्चापि समाख्यातः कर्तव्यश्च त्रिमूर्त्तिके ॥६५॥ यह मेरु प्रासाद का मान और स्वरूप वृषभ प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—वृषभ प्रासाद के कोणो के ऊपर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । यह एक सौ एक शृंग वाला मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लिये बनावे ॥६५॥ शृंग सख्या—कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रत्यथे १६, रथे २४, उपरथे १६, भद्रनन्दी के ऊपर ८, भद्रे १६, और एक शिखर, एव कुल १०१ शृंग । मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल— सर्वस्य हेममेरोश्च यत्पुण्यं त्रिप्रदक्षिणैः । कृते शैलेष्टकामिश्च तत्पुण्याल्लभतेऽधिकम् ॥६६॥ सम्पूर्ण सुवर्णमय मेरु की तीन प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, उस पुण्य से भी अधिक पुण्य पाषाण अथवा ईंट के बने हुवे मेरु प्रासाद की प्रदक्षिणा करने से होता है ॥६६॥ हरो हिरण्यगर्भश्च हरिर्दिनकरस्तथा । एते देवाः स्थिता मेरौ नान्येषां स कदाचन ॥६७॥ इति श्रीसूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रद्योतकारे श्रीभुवनदेवाचार्यो- क्तापराजितपृच्छायां केसर्यादिसान्धारप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनषष्ट्युत्तरशततमं सूत्रम् ॥ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन देवो को मेरु प्रासाद मे प्रतिष्ठित किये जाते है । अन्य दूसरे देवो को कभी भी उसमे प्रतिष्ठित नही करना चाहिये ॥६७॥ इति पंडित भगवानदास जैन अनुवादित केसरी आदि पचीस साधार प्रासाद निर्णयाधिकार समाप्त ।