प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६५ विभक्ति ग्यारहवीं । १६-श्रेयांसजिनवल्लभप्रासाद- ¹षोडशांशः प्रकर्त्तव्यः कर्णस्त्रयं रथस्त्रयम् । भद्रार्धं ²द्विपदं वत्स ! चतुर्दिक्षु नियोजयेत् ॥५४॥ निर्गमं पदमानेन स्वहस्ताङ्गुलमानतः । शृङ्गं च तिलकं कर्णे रथे भद्रे चैवोद्गमः ॥५५॥ श्रेयांसवल्लभो नाम प्रासादश्च मनोहरः । इति श्रेयांसजिनवल्लभप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करे । उनमे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । इसके अंगों का निकाला प्रासाद के पद के अनुसार हस्तांगुल मान का रखें । अर्थात् जितने हाथ का प्रासाद हो, उतने अंगुल निकलता रखें । कोण और प्रतिकोण के ऊपर एक एक शृंग और एक एक तिलक चढावे । तथा भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा श्रे यास जिनवल्लभ नाम का सुंदर प्रासाद है ॥५४ से ५५॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकोणे ८, एक शिखर, कुल १३ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८ । २०-सुकुलप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च शृङ्गञ्चत्वारि भद्रके ॥५६॥ सुकुलो नाम विज्ञेयो प्रासादो जिनवल्लभः । इति सुकुलप्रासादः ॥२०॥ मान और प्रमाण ऊपर के प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि-भद्र के ऊपर एक एक शृंग चढाने से सुकुल नाम का प्रासाद होता है । वह जिन देव को प्रिय है ॥५६॥ शृंग संख्या-कर्णों ४, प्रतिकर्णों ८ भद्रे ४, एक शिखर, कुल १७ । तिलक १२ । २१-कुलनंदनप्रासाद- उरःशृङ्गाष्टकं कुर्यात् प्रासादः कुलनन्दनः ॥५७॥ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद के भद्र के ऊपर आठ उरुशृंग चढाने से कुलनन्दन नाम का प्रासाद होता है ॥४७॥ शृंग संख्या-कोणे ४, रथे ८, भद्रे ८, एक शिखर, कुल २१ शृंग । तिलक १२ १. 'अष्टावशांश ।' २. 'त्रिपद ।'