भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६५ विभक्ति ग्यारहवीं । १६-श्रेयांसजिनवल्लभप्रासाद- ¹षोडशांशः प्रकर्त्तव्यः कर्णस्त्रयं रथस्त्रयम् । भद्रार्धं ²द्विपदं वत्स ! चतुर्दिक्षु नियोजयेत् ॥५४॥ निर्गमं पदमानेन स्वहस्ताङ्गुलमानतः । शृङ्गं च तिलकं कर्णे रथे भद्रे चैवोद्गमः ॥५५॥ श्रेयांसवल्लभो नाम प्रासादश्च मनोहरः । इति श्रेयांसजिनवल्लभप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करे । उनमे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । इसके अंगों का निकाला प्रासाद के पद के अनुसार हस्तांगुल मान का रखें । अर्थात् जितने हाथ का प्रासाद हो, उतने अंगुल निकलता रखें । कोण और प्रतिकोण के ऊपर एक एक शृंग और एक एक तिलक चढावे । तथा भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा श्रे यास जिनवल्लभ नाम का सुंदर प्रासाद है ॥५४ से ५५॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकोणे ८, एक शिखर, कुल १३ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८ । २०-सुकुलप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च शृङ्गञ्चत्वारि भद्रके ॥५६॥ सुकुलो नाम विज्ञेयो प्रासादो जिनवल्लभः । इति सुकुलप्रासादः ॥२०॥ मान और प्रमाण ऊपर के प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि-भद्र के ऊपर एक एक शृंग चढाने से सुकुल नाम का प्रासाद होता है । वह जिन देव को प्रिय है ॥५६॥ शृंग संख्या-कर्णों ४, प्रतिकर्णों ८ भद्रे ४, एक शिखर, कुल १७ । तिलक १२ । २१-कुलनंदनप्रासाद- उरःशृङ्गाष्टकं कुर्यात् प्रासादः कुलनन्दनः ॥५७॥ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद के भद्र के ऊपर आठ उरुशृंग चढाने से कुलनन्दन नाम का प्रासाद होता है ॥४७॥ शृंग संख्या-कोणे ४, रथे ८, भद्रे ८, एक शिखर, कुल २१ शृंग । तिलक १२ १. 'अष्टावशांश ।' २. 'त्रिपद ।'