प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्याय २१ पानी की लहर, मछली, मेढक, मगर, ग्रास, जल (कलश) सर्प शंख इत्यादि रूप बना करके शिला को सुशोभित करना चाहिये । कूर्मशिला के रूपो के संबंध में सूत्रधार वीरपाल विरचित बेडाया प्रासाद तिलक ग्रंथ का अध्याय दूसरे मे लीखा है कि— "कूर्ममानमिदं च गर्भरचनाथाग्नो शिलायां जलम्, याम्ये मीनमुखं च नैऋर्तिदिशि स्थाप्यं तथा दर्दुरम् । वारुण्या मकरश्च वायुदिशि वै ग्रासश्च सौम्ये ध्वनिः, नागं शङ्करदिक्षु पूर्वविषये कुम्भः शिलावह्नितः ॥” कूर्म के मान की गर्भ रचना कहता है कि-अग्निकोण मे पाणी की लहर, दक्षिण मे माछली, नैर्ऋत्य में मेढक, पश्चिम मे मगर, वायुकोण मे ग्रास, उत्तर मे शंख, ईशान मे सर्प और पूर्व दिशा मे कुम्भ की आकृतिया बनानी चाहिये । शिल्पियो की मान्यता वंश परंपरा से लहर को आकृति पूर्व दिशा मे बनाने की है। सूत्रारंभ नक्षत्र- सूत्रारम्भो गृहादीना-मुत्तरायां करत्रये । ब्राह्मे पुष्ये मृगे मैत्र्ये पौष्ण्ये वासचवारुणे ॥३०॥ प्रासाद और गृह आदि का सूत्रारम तीनो उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और उत्तराभाद्रपद), हस्त, चित्रा, स्वाति, रोहिणी, पुष्य, मृगशीर्ष, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रो मे करना चाहिये ॥३० शिला स्थापन नक्षत्र- शिलान्यासस्तु रोहिण्यां श्रवणे हस्तपुष्ययोः । मृगशीर्षे च रेवत्या-मुत्तरात्रितये शुभः ॥३१॥ रोहिणी, श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशीर, रेवती और तीनो उत्तरा इन नक्षत्रो मे शिलाकी स्थापना करना शुभ है ॥३१॥ देवालय का निर्माणस्थान- नद्यां सिद्धाश्रमे तीर्थे पुरे ग्रामे च गह्वरे । वापी-वाटी-तडागादि-स्थाने कार्यं सुरालयम् ॥३२॥