भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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अथ प्रासादमण्डने तृतीयोऽध्यायः प्रासादधारिणी खरशिला— अतिस्थूला¹ सुविस्तीर्णा प्रासादधारिणी शिला । अतीवसुदृढा कार्या इष्टिकाचूर्णवारिभिः² ॥१॥ प्रासाद को धारण करनेवाली जो आधार शिला है, यह जगती के दासा के ऊपर और प्रथम भिट्ट के नीचे जो बनायी जाती है, उसको खरशिला कहते है। वह अतिस्थूल और अच्छी तरह विस्तारवाली बनावे, तथा ईंट, चूना और पानी से बहुत मजबूत बनावे ॥१॥ खरशिला का मान— "प्रासादच्छन्दमस्योर्ध्वं दृढखरशिलोत्तमा । एकहस्ते पादहस्तः पञ्चान्तेऽङ्गुलवृद्धितः ॥ अर्धार्द्धाङ्गुलं तदूर्ध्वे तु नवान्तं सुदृढोत्तमा । पादवृद्धि पुनर्द्दद्याद् हस्ते हस्ते तथा पुनः ॥ हस्तानां त्रिंशतिर्याव-दर्द्धपादा तदूर्ध्वतः । विशत्यङ्गूलपिण्डा च शतार्द्धे तु खरा शिला ।।” अप० सू० १२३ प्रासादतल के ऊपर बहुत मजबूत और उत्तम खरशिला बनावे । वह एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे छः अगुल के उदयवाली बनावे । पीछे दो से पाच हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से नव हाथ तक आधा २ अंगुल, दस से तीस हाथ तक पाव २ अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ जब बढ़ा करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के लिये लगभग बीस अंगुल के ऊंचाई की खरशिला होनी चाहिये । क्षी०रार्णव अध्याय १०२ में कहा है कि— “प्रथमभिट्टस्याधस्तात् पिण्डो वर्गा (कूर्म ?) शिलोत्तमा । तस्य पिण्डस्य चार्धेन खरशिलापिण्डमेव च ॥” प्रथम भिट्ट के नीचे कूर्मशिला की मोटाई से अर्धमान की खरशिला की मोटाई रक्खे । (१) अतिस्थूलातिविस्तीर्णा । (२) 'इष्टका' । प्रा० ६

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