प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
पृष्ठ 108, कुल 131 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 108
| ९८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
|---|
| किमुताकाशकारणस्य पुरुषस्य तस्मादसमानो दृष्टान्तः। | आकाशके भी कारणस्वरूप पुरुषकी तो बात ही क्या है। इसलिये यह दृष्टान्त विषम है। |
| किं दृष्टान्तेन वचनात्स्यादिति चेत्। | **मध्यस्थ—**दृष्टान्तसे क्या है ? श्रुतिके वचनसे तो ऐसा ही होना चाहिये। |
| न; वचनस्याकारकत्वात्। न हि वचनं वस्तुनोऽन्यथाकरणे व्याप्रियते। किं तर्हि? यथाभूतार्थावद्योतने। तस्मादन्तःशरीर इत्येतद्वचनमण्डस्यान्तर्व्योमेतिवच्च द्रष्टव्यम्। | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वचन कुछ करनेवाला नहीं है। किसी वस्तुको कुछ-का-कुछ कर देनेके लिये वचन प्रवृत्त नहीं हुआ करता। तो फिर वह क्या करता है? वह तो ज्यों-की-त्यों वस्तु दिखलानेमें ही प्रवृत्त होता है। अतः 'अन्तःशरीरे' इस वचनको 'अण्डेके भीतर आकाश' इस कथनके समान ही समझना चाहिये। |
| उपलब्धिनिमित्तत्वाच्च, दर्शनश्रवणमननविज्ञानादिलिङ्गैः अन्तःशरीरे परिच्छिन्न इव ह्युपलभ्यते पुरुष उपलभ्यते चात उच्यतेऽन्तःशरीरे सोम्य स पुरुष इति। न पुनराकाशकारणः सन्कुण्डबदरवच्छरीरपरिच्छिन्न | इसके सिवा उपलब्धिका कारण होनेसे भी [ ऐसा कहा गया है ]। दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान (जानना) आदि लिङ्गोंसे पुरुष शरीरके भीतर परिच्छिन्न-सा दिखलायी देता है, तथा इस (शरीर) में ही उसकी उपलब्धि भी होती है। इसीलिये यह कहा गया है कि 'हे सोम्य! वह पुरुष इस शरीरके भीतर है।' नहीं तो, आकाशका भी कारण होकर वह कूँडेमें बेरके समान शरीरमें परिच्छिन्न है—ऐसी |