भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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१०८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ६
शास्त्रप्रणयनाद्युपपत्तिं चाहान्यत्र परमार्थवस्तुस्वरूपादविद्याविषये। "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) इत्यादि विस्तरतो वाजसनेयके। <br><br> अत्र च विभक्ते विद्याविद्ये परापरे इत्यादावेव शास्त्रस्य। अतो न तार्किकवादभटप्रवेशो वेदान्तराजप्रमाणबाहुगुप्त इहात्मैकत्वविषय इति। <br><br> एतेनाविद्याकृतनामरूपाद्युपाधिकृत्तानेकशक्तिसाधनकृतभेदवत्त्वादब्रह्मणः सृष्ट्यादिकर्तृत्वे साधनाद्यभावो दोषः प्रत्युक्तो वेदितव्यः परैरुक्त आत्मानर्थकर्तृत्वादिक्षेपश्च। <br><br> यस्तु दृष्टान्तो राज्ञः सर्वार्थकारिणि कर्तर्युपचाराद्राजा कर्तेति सोऽत्रानुपपन्नः "स ईक्षांचक्रे" इति श्रुतेर्मुख्यार्थबाध- <br> (दृष्टेः चेतनपूर्वकत्व-स्थापनम्)परमार्थवस्तुके स्वरूपसे अन्यत्र अविद्यासम्बन्धी विषयोंमें "जहाँ द्वैत-सा होता है" आदि बृहदारण्यक-श्रुतिमें शास्त्ररचना आदिकी उपपत्ति भी विस्तारसे बतलायी है। <br><br> यहाँ (अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद्में) तो शास्त्रके आरम्भमें ही परा और अपरारूप विद्या तथा अविद्याका विभाग किया है। अतः वेदान्त-रूपी राजाकी प्रमाणरूपिणी भुजाओंसे सुरक्षित इस आत्मैकत्व-राज्यमें तार्किक-वादरूप योद्धाओंका प्रवेश नहीं हो सकता। <br><br> इस प्रतिपादनसे ब्रह्मका सृष्टि आदिके कर्तृत्वमें साधनादिका अभावरूप दोष भी निरस्त हुआ समझना चाहिये, क्योंकि अविद्याकृत नाम-रूप आदि उपाधिके कारण ब्रह्म अनेक शक्ति और साधनजनित भेदोंसे युक्त है; तथा इसीसे हमारे विपक्षियोंका बतलाया हुआ आत्माका अपना ही अनर्थ-कर्तृत्वरूप दोष भी निवृत्त हो जाता है। <br><br> और तुमने जो यह दृष्टान्त दिया कि राजाका सारा कार्य करनेवाले सेवकमें ही 'राजा कर्ता है' ऐसा उपचार किया जाता है, सो यहाँ ठीक नहीं है, क्योंकि इससे "स ईक्षांचक्रे" इस प्रमाणभूता