भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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११६ · प्रश्नोपनिषद् · [ प्रश्न ६


स्तुतिपूर्वक आचार्यकी वन्दना

ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥

तब उन्होंने उनकी पूजा करते हुए कहा—'आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने कि हमें अविद्याके दूसरे पारपर पहुँचा दिया है; आप परमर्षिको हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो ॥ ८ ॥

ततस्ते शिष्या गुरुणानु-तब गुरुसे उपदेश पाये हुए
शिष्टास्तं गुरुं कृतार्थाः सन्तोउन शिष्यों ने कृतार्थ हो, उस
विद्यानिष्क्रयमपश्यन्तः किंविद्यादानका कोई अन्य प्रतिकार
कृतवन्त इत्युच्यते—अर्चयन्तःन देखकर क्या किया सो बतलाते
पूजयन्तः पादयोः पुष्पाञ्जलि-हैं—उन्होंने गुरुजीका अर्चन
प्रकिरणेन प्रणिपातेन चअर्थात् चरणोंमें पुष्पाञ्जलिप्रदान
शिरसा । किमृचुरित्याह—त्वं हिएवं शिर झुकाकर प्रणाम करके
नोऽस्माकं पिता ब्रह्मशरीरस्यउनका पूजन करते हुए [कहा] ।
विद्यया जनयितृत्वान्नित्यस्या-क्या कहा, सो बतलाते हैं—
जरामरस्याभयस्य । यस्त्वमेव'विद्याके द्वारा हमारे नित्य,
अस्माकमविद्याया विपरीतज्ञानात्अजर, अमर एवं अभयरूप ब्रह्म-
जन्मजरामरणरोगदुःखादिग्रा-शरीरके जनयिता होनेके कारण
हादपारादविद्यामहोदधेर्विद्या-आप तो हमारे पिता हैं; जिन
प्लवेन परमपुनरावृत्तिलक्षणंआपने विद्यारूप नौकाके द्वारा
हमें विपरीत ज्ञानरूप अविद्यासे
अर्थात् जन्म, जरा, मरण, रोग
और दुःख आदि ग्राहोंके कारण
जो अपार है उस अविद्यारूप
समुद्रसे उस ओर महासागरके