प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| ४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न १ |
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| युवप्रत्ययः । ते हैते ब्रह्मपरा अपरं ब्रह्म परत्वेन गतास्तदनुष्ठाननिष्ठाश्च ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः—किं तत् यन्नित्यं विज्ञेयमिति तत्प्राप्त्यर्थं यथाकामं यतिष्याम इत्येवं तदन्वेषणं कुर्वन्तस्तदधिगमायैष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीत्याचार्यमुपजग्मुः । कथम् ? ते ह समित्पाणयः समिद्भारगृहीतहस्ताः सन्तो भगवन्तं पिप्पलादमाचार्यमुपसन्ना उपजग्मुः ॥ १ ॥ | 'फक्' प्रत्यय होकर उसके स्थानमें 'आयन' आदेश ] हुआ है। ये सब ब्रह्मपर अर्थात् अपर ब्रह्मको ही परभावसे प्राप्त हुए और तदनुकूल अनुष्ठानमें तत्पर अतएव ब्रह्मनिष्ठ ऋषिगण परब्रह्मका अन्वेषण करते हुए—वह ब्रह्म क्या है ? जो नित्य और विज्ञेय है; उसकी प्राप्तिके लिये ही हम यथेच्छ प्रयत्न करेंगे—इस प्रकार उसकी खोज करते हुए, उसे जाननेके लिये यह समझकर कि 'ये हमें सब कुछ बतला देंगे' आचार्यके पास गये । किस प्रकार गये ? [ इसपर कहते हैं—] वे सब समित्पाणि अर्थात् जिन्होंने अपने हाथोंमें समिधाके भार उठा रखे हैं ऐसे होकर पूज्य आचार्य भगवान् पिप्पलादके समीप गये ॥१॥ |
तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥
कहते हैं, उस ऋषिने उनसे कहा—'तुम तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे युक्त होकर एक वर्ष और निवास करो; फिर अपनी इच्छानुसार प्रश्न करना, यदि मैं जानता होऊँगा तो तुम्हें सब बतला दूँगा' ॥ २ ॥