प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
पृष्ठ 16, कुल 131 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 16
| ६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न १ |
|---|
| अथ संवत्सरादूर्ध्वं कबन्धी कात्यायन उपेत्योपगम्य पप्रच्छ पृष्टवान् । हे भगवन्कुतः कस्माद्ध वा इमा ब्राह्मणाद्याः प्रजाः प्रजायन्त उत्पद्यन्ते । अपरविद्याकर्मणोः समुच्चितयोर्यत्कार्यं या गतिस्तद्वक्तव्यमिति तदर्थोऽयं प्रश्नः ॥ ३ ॥ | तदनन्तर एक वर्ष पीछे कात्यायन कबन्धीने [गुरुजीके] समीप जाकर पूछा—'भगवन् ! यह ब्राह्मणादि सम्पूर्ण प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?' अर्थात् अपरब्रह्मविषयक ज्ञान एवं कर्मके समुच्चयका जो कार्य है और उसकी जो गति है वह बतलानी चाहिये । उसीके लिये यह प्रश्न किया गया है ॥ ३ ॥ |
रयि और प्राणकी उत्पत्ति
तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥
उससे उस पिप्पलाद मुनिने कहा—'प्रसिद्ध है कि प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाले प्रजापतिने तप किया । उसने तप करके एक जोड़ा उत्पन्न किया [और सोचा—] ये रयि और प्राण दोनों ही मेरी अनेक प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करेंगे' ॥ ४ ॥
| तस्मा एवं पृष्टवते स होवाच तदपाकरणयाह । प्रजाकामः प्रजा आत्मनः सिसृक्षुर्वै प्रजापतिः सर्वात्मा सञ्जगत्स्रक्ष्यामि | अपनेसे इस प्रकार प्रश्न करनेवाले कबन्धीसे उसकी शङ्का निवृत्त करनेके लिये पिप्पलाद मुनिने कहा—प्रजाकाम अर्थात् अपनी प्रजा रचनेकी इच्छावाले प्रजापतिने 'मैं सर्वात्मा होकर जगत्की रचना |