भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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३२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


जिनमें कुटिलता अनृत और माया (कपट) नहीं है उन्हें यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

यथा गृहस्थानामनेकविरुद्ध-संव्यवहारप्रयोजनवत्त्वाज्जिह्मं कौटिल्यं वक्रभावोऽवश्यंभावि तथा न येषु जिह्मम् । यथा च गृहस्थानां क्रीडानर्मादिनिमित्तम् अनृतमवर्जनीयं तथा न येषु तत् । तथा माया गृहस्थानामिव न येषु विद्यते । माया नाम बहिरन्यथात्मानं प्रकाश्यान्यथैव कार्यं करोति सा माया मिथ्याचाररूपा । मायेत्येवमादयो दोषा येष्वधिकारिषु ब्रह्मचारिवानप्रस्थभिक्षुषु निमित्ताभावान्न विद्यन्ते तत्साधनानुरूपेणैव तेषाम् असौ विरजो ब्रह्मलोक इत्येषा ज्ञानयुक्तकर्मवतां गतिः। पूर्वोक्तस्तु ब्रह्मलोकः केवलकर्मिणां चन्द्रलक्षण इति ॥ १६ ॥जिस प्रकार अनेकों विरुद्ध व्यवहाररूप प्रयोजनवाला होनेसे गृहस्थमें जिह्म—कुटिलता यानी वक्रता होना निश्चित है उस प्रकार जिनमें जिह्म नहीं है, गृहस्थोंमें जिस प्रकार क्रीडादि-निमित्तसे होनेवाला अनृत अनिवार्य है वैसा जिनमें अनृत नहीं है तथा जिनमें गृहस्थोंके समान मायाका भी अभाव है । अपने-आपको बाहरसे अन्य प्रकार प्रकट करते हुए जो अन्यथा कार्य करना है वही मिथ्याचाररूपा माया है । इस प्रकार जिन एकान्तनिष्ठ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ और भिक्षुओंमें, कोई निमित्त न रहनेके कारण, माया आदि दोष नहीं हैं उन्हें उनके साधनोंकी अनुरूपतासे ही यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । इस प्रकार यह ज्ञान (उपासना) सहित कर्मानुष्ठान करनेवालोंकी गति कही । पूर्वोक्त चन्द्रमारूप ब्रह्मलोक तो केवल कर्मठोंके लिये ही कहा है ॥ १६ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये प्रथमः प्रश्नः ॥ १ ॥