प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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२४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २
शरीरके आधारभूत—आकाशादि
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्द्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
तब उससे आचार्य पिप्पलादने कहा—वह देव आकाश है। वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, वाक् (सम्पूर्ण कर्मेन्द्रियाँ), मन (अन्तः-करण) और चक्षु (ज्ञानेन्द्रियसम्मूह) [ये भी देव ही हैं]। वे सभी अपनी महिमाको प्रकट करते हुए कहते हैं—‘हम ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करते हैं’ ॥ २ ॥
| एवं पृष्टवते तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुः अग्निः आपः पृथिवीत्येतानि पञ्च महाभूतानि शरीरारम्भकाणि वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रमित्यादीनि [कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियाणि च । कार्यलक्षणाः करणलक्षणाश्च ते देवा आत्मनो माहात्म्यं प्रकाश्याभिवदन्ति स्पर्धमाना अहं.श्रेष्ठतायै ।<br><br>कथं वदन्ति ? वयमेतद्द्बाणं कार्यकारणसंघातमवष्टभ्य प्रासादम् | इस प्रकार पूछते हुए उस भार्गवसे पिप्पलादने कहा—निश्चय आकाश ही वह देव है तथा [उसके सहित] वायु, अग्नि, जल और पृथिवी—ये शरीरको आरम्भ करनेवाले पाँच भूत एवं वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियाँ—ये कार्य (पञ्चभूत) और करण (इन्द्रिय) रूप देव अपनी महिमाको प्रकट करते हुए अपनी-अपनी श्रेष्ठताके लिये परस्पर स्पर्धापूर्वक कहते हैं।<br><br>किस प्रकार कहते हैं ? [सो बतलाते हैं—] इस कार्यकारणके संघातरूप शरीरको, जिस प्रकार |