प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
| तत्तत्र यथा लोके मक्षिका मधुकराः स्वराजानं मधुकरराजानम् उत्क्रामन्तं प्रति सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्ते प्रतितिष्ठन्ति । यथायं दृष्टान्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं चेत्यादयस्त उत्सृज्याश्रद्दधानतां बुद्ध्वा प्राणमाहात्म्यं प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति स्तुवन्ति ४ | मधुमक्षिकाएँ अपने सरदार मधुकरराजके उठनेके साथ ही सबकी सब उठ जाती हैं और उसके बैठनेपर सबकी सब बैठ जाती हैं। जैसा यह दृष्टान्त है वैसे ही वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी हो गये। तब वे वागादि अपने अविश्वासको छोड़कर और प्राणकी महिमाको जानकर सन्तुष्ट हो प्राणकी स्तुति करने लगे ॥४॥ |
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| कथम्— | किस प्रकार [स्तुति करने लगे, सो बतलाते हैं—] |
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एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥
यह प्राण अग्नि होकर तपता है, यह सूर्य है, यह मेघ है, यही इन्द्र और वायु है तथा यह देव ही पृथिवी, रयि और जो कुछ सत् असत् एवं अमृत है, वह सब कुछ है ॥ ५ ॥
| एष प्राणोऽग्निः संस्तपति ज्वलति, तथैष सूर्यः सन् प्रकाशते, तथैष पर्जन्यः सन् वर्षति । किं च मघवानिन्द्रः सन् प्रजाः पालयति, जिघांसत्यसुररक्षांसि । एष वायुः | यह प्राण अग्नि होकर तपता—प्रज्वलित होता है । तथा यह सूर्य होकर प्रकाशित होता है और मेघ होकर बरसता है । यही मघवा—इन्द्र होकर प्रजाका पालन करता तथा असुर और राक्षसोंका वध करना चाहता है । यही आवह- |
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