भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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३० प्रश्नोपनिषद् [प्रश्न २


किं च—तथा—

देवानामासि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

तू देवताओंके लिये वह्नितम है, पितृगणके लिये प्रथम स्वधा है और अथर्वाङ्गिरस ऋषियों [ यानी चक्षु आदि प्राणों ] के लिये सत्य आचरण है ॥ ८ ॥

देवानामिन्द्रादीनामसि भवसि त्वं वह्नितमो हविषां प्रापयितृतमः । पितॄणां नान्दीमुखे श्राद्धे या पितृभ्यो दीयते स्वधान्नं सा देवप्रधानमपेक्ष्य प्रथमा भवति । तस्या अपि पितृभ्यः प्रापयिता त्वमेवेत्यर्थः । किं चर्षीणां चक्षुरादीनां प्राणानामङ्गिरसामङ्गिरसभूतानामथर्वणां तेषामेव "प्राणो वाथर्वा" इति श्रुतेः, चरितं चेष्टितं सत्यमवितथं देहधारणाद्युपकारलक्षणं त्वमेवासि ॥ ८ ॥तू इन्द्रादि देवताओंके लिये वह्नितम—हवियोंको पहुँचानेवालोंमें श्रेष्ठ है, पितृगणकी प्रथम स्वधा है—नान्दीमुख श्राद्धमें पितरोंको जो अन्नमयी स्वधा दी जाती है वह देवप्रधान कर्मकी अपेक्षासे प्रथम है, उस प्रथम स्वधाको भी पितरोंको प्राप्त करानेवाला तू ही है—ऐसा इसका भावार्थ है। तथा ऋषियों यानी चक्षु आदि प्राणोंका, जो कि "प्राणो वाथर्वा" इस श्रुतिके अनुसार अंगिरस्—अंगके रसस्वरूप* अथर्वा हैं, उनका सत्य—अवितथ अर्थात् देहधारणादिमें उपकारी चरित—आचरण भी तू ही है ॥ ८ ॥

* प्राणोंके अभावमें शरीरको सूखते देखा गया है; अतः उन्हें अङ्गका रस कहते हैं ।