भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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भावना की गयी है। उस अवस्थामें जन्म-जन्मान्तरोंकी वासनाओंके अनुसार मन ही अपनी महिमाका अनुभव करता है तथा जिस समय वह पित्तसंज्ञक सौर तेजसे अभिभूत होता है उस समय स्वप्नावस्था-से निवृत्त होकर सुषुप्तिमें प्रवेश करता है और आत्मामें ही लीन हो जाता है। आत्माका यह सोपाधिक स्वरूप ही द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता आदि है; इसका अधिष्ठान परब्रह्म है। उसका ज्ञान प्राप्त होनेपर पुरुष उसीको प्राप्त हो जाता है।

पाँचवें प्रश्नमें ओंकारका पर और अपर ब्रह्मके प्रतीकरूपसे वर्णन कर उसके द्वारा अपर ब्रह्मकी उपासना करनेवालेको क्रममुक्ति और परब्रह्मकी उपासना करनेवालेको परब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है तथा उसकी एक, दो या तीन मात्राओंकी उपासनासे प्राप्त होनेवाले भिन्न-भिन्न फलोंका निरूपण किया है। फिर छठे प्रश्नमें सुकेशाके प्रश्नका उत्तर देते हुए आचार्य पिप्पलादने मुक्तावस्थामें प्राप्त होने-वाले निरुपाधिक ब्रह्मका प्राणादि सोलह कलाओंके आरोपपूर्वक प्रत्यगात्मरूपसे निरूपण किया है। वहाँ भगवान् भाष्यकारने आत्मा-के सम्बन्धमें भिन्न-भिन्न मतावलम्बियोंकी कल्पनाओंका निरसन करते हुए बड़ा युक्तियुक्त विवेचन किया है। यही संक्षेपमें इस उपनिषद्का सार है।

इस प्रकार, हम देखते हैं कि इस उपनिषद्में प्रधानतया पर और अपर ब्रह्मविषयक उपासनाका ही वर्णन है तथा परब्रह्मकी अपेक्षा अपर ब्रह्मके स्वरूपका विशेष विवेचन किया गया है। परब्रह्मके स्वरूपका विशद और स्फुट निरूपण तो मुण्डकोपनिषद्में हुआ है। अतः इस उपनिषद्‌का उद्देश्य उस तत्त्वज्ञानकी योग्यता प्राप्त कराना है; यह हृदयभूमिको इस योग्य बनाती है कि उसमें तत्त्वज्ञानरूपी अङ्कुर जम सके। इसके अनुशीलनद्वारा हम वह योग्यता प्राप्त कर सकें—ऐसी भगवान्‌से प्रार्थना है।

<div align="right">अनुवादक</div>