प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५
| यद्वाह्यं ह वै प्रसिद्धं सामान्यं तेजस्तच्छरीर उदान उदानं वायुमनुगृह्णाति स्वेन प्रकाशेनेत्यभिप्रायः । यस्मात्तेजःस्वभावो वाह्यतेजोऽनुगृहीत उत्क्रान्तिकर्ता तस्माद्यदा लौकिकः पुरुष उपशान्ततेजा भवति; उपशान्तं स्वाभाविकं तेजो यस्य सः, तदा तं क्षीणायुषं मुमूर्षु विद्यात् । स पुनर्भवं शरीरान्तरं प्रतिपद्यते । कथम् ? सहेन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः प्रविशद्भिर्वागादिभिः ॥ ९ ॥ | जो [ आदित्यसंज्ञक ] प्रसिद्ध बाह्य सामान्य तेज है वही शरीरमें उदान है; तात्पर्य यह है कि वहीं अपने प्रकाशसे उदान वायुको अनुगृहीत करता है । क्योंकि उत्क्रमण करनेवाला [ उदान-वायु ] तेजःस्वरूप है—बाह्य तेजसे अनुगृहीत होनेवाला है इसलिये जिस समय लौकिक पुरुष उपशान्ततेजा होता है अर्थात् जिसका स्वाभाविक तेज शान्त हो गया है ऐसा होता है उस समय उसे क्षीणायु—मरणासन्न समझना चाहिये । वह पुनर्भव यानी देहान्तरको प्राप्त होता है । किस प्रकार प्राप्त होता है ? [ इसपर कहते हैं— ] मनमें लीन—प्रविष्ट होती हुई वागादि इन्द्रियोंके सहित [ वह देहान्तरको प्राप्त होता है ] ॥ ९ ॥ |
मरणकालीन संकल्पका फल
| मरणकाले— | मरणकालमें— |
|---|
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः
सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
इसका जैसा चित्त (संकल्प) होता है उसके सहित यह प्राणको प्राप्त होता है । तथा प्राण तेजसे ( उदानवृत्तिसे ) संयुक्त हो [ उस भोक्ताको ] आत्माके सहित संकल्प किये हुए लोकको ले जाता है ॥ १० ॥