भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

( 198 ) आपने मेरा राज्याभिषेक करना चाहा था, वह अब पूरा हुआ। अब मैं पृथ्वी पर पुण्य भार का वहन करने वाला राजा बन गया हूं। मैंने न्यायपूर्वक प्रजापालन का उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया है। (११) भरत— महाराज की पदवी प्राप्त करने वाले, राजच्छत्र ग्रहण करने वाले, प्रकाशमान मुकुट पहनने वाले, तीर्थों के जल से अभिषेक स्वीकार करने वाले, पूजनीय, राजलक्ष्मी को प्राप्त करने वाले, प्रजाओ के समूहों से जय-जयकार की ध्वनि वाले, नये चन्द्रमा की भाँति आर्य राम को देखते हुए मुझे तृप्ति नही हो रही है । (१२) शत्रुघ्न— जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय से सारा ससार प्रकाशित होने लगता है, उसी प्रकार आर्य राम के राज्याभिषेक से निष्कलक मेरा यह रघुकुल फिर से प्रकाशमान हो रहा है। (१३) राम— वत्स लक्ष्मण, अब मैंने राज्य पा लिया है। लक्ष्मण— सौभाग्य की बात है कि आप वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। (प्रवेश करके) काञ्चुकीय— महाराज की जय हो। ये श्रीमान् विभीषण सूचित करते हैं कि सुग्रीव, नील, मैन्द, जाम्बवान्, हनुमान् आदि आपके अनुचर निवे- दन कर रहे है— "अहोभाग्य, आपको बधाई।" राम— उनमे कह दो कि "आप सहायकों की कृपा से सब विजय है।" काञ्चुकीय-- जैसी महाराज की आज्ञा। कैकेयी— मैं सौभाग्यशालिनी हूं। इस वैभव को मैं अयोध्या मे भी देखना चाहती हूँ। राम— आप देखेंगी। (देखकर) अरे, यह समूचा तपोवन सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहा है। (विचार कर के) अच्छा समझ गया। आकाश मे रावण का पुष्पक विमान आ गया है। यह ठीक समय पर याद करने मात्र से उपस्थित हो जाता है। तो आप सब इस पर चढिए। (सब चढते हैं)