भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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( २३ ) (३) भरत [हस्तलिखित: निर्लोभी] (१) महाकवि भास ने भरत का एक आकर्षक चरित्र उपस्थित किया है, जो पश्चात्ताप के दुःख की आँच से निखरा है। उसका व्यक्तित्व एक प्रबल सङ्कल्प शक्ति पर आधारित है। परिस्थितियों के कारण भरत के जीवन मे इतने उतार-चढ़ाव आते है कि वह बहता जाता है। (२) अपने मन मे मधुर कल्पनाएँ संजोए हुए भरत ननिहाल से लौटता है, किन्तु अयोध्या के निकट प्रतिमा गृह मे विद्यमान दशरथ की मूर्ति को देखकर उसे नियति का क्रूर अट्टहास सुनाई देता है। वह कैकयी को बुरा-भला कह कर राम को लाने जनस्थान दौड़ता है, पर असफल रहता है। (३) भरत का त्याग वास्तव मे स्तुत्य है, जो परिवार के विघटन को आगे नहीं बढ़ने देता। वस्तुतः विश्व के इतिहास में ऐसा चरित्र दुर्लभ है, जो अपने को प्राप्त वैभव को इस प्रकार ठुकरा दे। व्यवहार मे तो हम दूसरी ही प्रकार की बातो को पाते है, जो भरत के आचरण से विलोम हैं। (४) कैकयी के हृदय में अपने पुत्र भरत को राज्य दिलाने की विशे- षाधिकार की भावना थी। किन्तु भरत ने उसे अपने भ्रातृत्व की वेदी पर चढ़ा दिया। भरत का यह विचार अपने क्षणिक भावावेश पर नही, अपितु अन्तर्व्यथा से उत्पन्न श्रद्धा व निष्ठा की ज्वाला मे तपा हुआ था। तभी तो राम कहते हैं कि "जो यश मैंने दीर्घ काल मे पाया, भरत ने वह अति शीघ्र संचित कर लिया।” (4.26) (५) राम के प्रति भरत की निरतिशय भावुकता श्रद्धामूलक थी। भरत के समर्पण, चिन्तन, साधन एवं जीवन मे भी राम ही थे। लक्ष्मण ने इस तथ्य को अच्छी तरह समझ कर प्रकट किया है— "अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः। संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति॥" (4.11) (४) लक्ष्मण (१) रामकथा के अन्तर्गत लक्ष्मण का चरित्र कठोरता एवं क्रोध से परिपूर्ण उपलब्ध होता है। किन्तु उसे कोमल, स्वाभाविक और सरल रीति से अभिव्यक्त कर नाटककार ने सांस्कृतिक चेतना का विकास किया है। (२) लक्ष्मण के चरित्र में त्याग, भ्रातृप्रेम, आत्मविश्वास, वीरता