प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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प्राप्त होता है। कुमार भरत के सम्पर्क मे उसका हृदय पश्चात्ताप के आँसुओ से घुल कर सर्वथा स्वच्छ और निर्मल हो गया है। पहले तो प्रतिहारी से यह जान कर कि भरत उससे मिलने आया है, वह घबरा जाती है कि भरत, पता नही किस बात का उलाहना दे बैठें। किन्तु वह शीघ्र ही संभल जाती है और भरत के सामने राजा दशरथ को दिए अन्धमुनि के शाप का रहस्योद्- घाटन करती है। वस्तुतः कैकेयी उदात्तचरिता है। उसने राम के लिए वन- वास का वर इसलिए माँगा था कि उन्हें ऋषि के द्वारा दिए गए शाप से मुक्ति मिले। इस तथ्य को वह भरत के सामने उचित अवसर पर अर्थात् सीता हरण के बाद स्पष्ट कर देती है। कैकेयी के चरित्र मे भावनाओ की गम्भीरता और विविधता का जैसा आदर्श दृढ रूप में प्रकट किया गया है, वैसा इतनी कुशलता के साथ किसी अन्य राम काव्य में उपलब्ध नही होता। प्रतिमा नाटक की कैकेयी स्वतन्त्र व्यक्तित्व के पूर्ण जीवन से श्रोतप्रोत है। इसमें सजीवता और स्वाभाविकता है। यह पात्र करुणा से भरा है। वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त होने पर इसके सम्मुख भरत भी नतमस्तक हो जाता है। रामायण की कैकेयी की तुलना में यह बहुत ही अच्छे रूप मे प्रस्तुत की गई है।