भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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भास का जीवनवृत्त भास ने अपनी कृतियो मे अपने सम्बन्ध मे कुछ भी निर्देश नही किया है । अतः इनके जीवनवृत्त के बारे मे निश्चित जानकारी प्राप्त करना कठिन है । किन्तु इनके विषय मे कई किम्वदन्तिया प्रचलित है तथा उनकी रचनाओ में भी कुछ ऐसे संकेत विद्यमान है, जिनसे उनके जीवन वृत्त पर प्रकाश पडता है । दन्तकथाये — प्रचलित दन्तकथा के अनुसार भास जाति के धोबी या धावक थे । आचार्य मम्मट ने काव्य प्रकाश मे इनका उल्लेख किया है । इसके अनुसार श्री हर्ष की रत्नावली आदि नाटिकाओ के प्रणयन मे धावक कवि सहायक था और उसको धन दिया गया था । कतिपय विद्वान् भास की उपाधि धावक मानते है । किन्तु भास को श्री हर्ष कालीन स्वीकारना (सप्तम शताब्दी ईस्वी) कथमपि युक्तियुक्त नही है । दूसरी किम्वदन्ती के अनुसार भास जाति के धोबी थे और उन्ही का नाम घटकर्पर था । समीक्षा करने पर यह दन्तकथा भी तथ्यशून्य है, क्योकि घटकर्पर कालिदास के समकालीन हैं । सम्राट् विक्रम की राजसभा के नवरत्नों में कालिदास और घटकर्पर का नाम आता है । अतः भास और घटकर्पर की अभिन्नता स्वीकार नही की जा सकती है । तीसरी दन्तकथा मे बताया गया है कि एक बार व्यास और भास मे प्रतिष्ठा के लिए झगड़ा हुआ । व्यास अपने को श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली कवि मानते थे और भास अपने को । निर्णय के लिए दोनों के ग्रन्थ अग्नि को अर्पित किये गए । कहा जाता है कि व्यास के ग्रन्थो को अग्नि ने भस्म कर दिया, पर भास के नाटको मे स्वप्नवासवदत्तम् अग्नि मे भस्म न हो सका । राजशेखर ने इसकी पुष्टि की है । इसका आशय यह है कि भास भी व्यास के समान प्राचीन एव यशस्वी कवि है । इन दोनो के कल्पित कलह से यह भी ध्वनित होता है कि नाटककार भास महाकवि व्यास के समान अनेक कृतियो के लेखक हैं ।