प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 65 ) अन्वय—वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं वा उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरुषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप- ते। (३०) अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणां वनवासिनां किं दृश्यम् । राजा अस्मासु षु नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१) न्दी अर्थ क्ष्मण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण, माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस वल्कल को क्यो बाध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन गए है । (२६) ाम—हे सीते, इसे रोको । सीता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ । लक्ष्मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बायां होगा । (२७) सीता—आप पतिदेव दया करें । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है । राम—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान, संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोड़ो के लिए लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण करो । (२८) लक्ष्मण—कृतकृत्य हो गया हूं । (लेकर पहनता है ) राम--इस समाचार को सुन कर पुरवासी लोग राजमार्ग पर एकत्रित हो गए है । इन्हे समझाकर हटा दीजिए । लक्ष्मण—आर्य, मैं आगे चलता हूँ । हट जाइए, हट जाइए । राम—सीते, अपना घू घट हटा दो । सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (घूंघट हटाती है) राम--हे हे पुरवासियो, आप लोग सुनिए, सुनिए । आप लोग निःशंक होकर अश्रुपूर्ण नेत्रो से सीता को देख ले । यज्ञ, विवाह, सकट और वन गमन के अवसर पर स्त्रियो को देखना निर्दोष है । (२६) (प्रवेश करके)