प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियां १०५ ८. 'शाङ्कर'—शं करोति इति शंकरः जो कल्याण करता है वह 'शंकर' है। यह शिव का दूसरा नाम है। 'शाङ्करोपनिषद्' का अर्थ है शिव सम्बन्धी रहस्यशास्त्र अर्थात् शैवदर्शन । ६. उपनिषद्—उप + नि + सद्—इसका शाब्दिक अर्थ है (आचार्य के) पास अच्छी तरह बैठना । अर्थात् इस प्रकार बैठकर रहस्य-ज्ञान की प्राप्ति । शांकरोपनिषद् का अर्थ है शंकर सम्बन्धी रहस्यज्ञान । श्री शंकराचार्य ने उपनिषद का अर्थ आत्मज्ञान द्वारा अविद्या का नाश भी किया है, किन्तु यहाँ इसका अर्थ रहस्य या रहस्यज्ञान ही है। १०. संसार—संसरति इति संसारः । जो स्थिर न हो, जो सदा सरकता रहे, चलता रहे उसे संसार कहते हैं। संसार का अर्थ जीव का एक योनि या अवस्था से दूसरो योनि या अवस्था में संसरण या भ्रमण करते रहना भी है। यहाँ संसार शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। संसार जगत् रूप में विष नहीं है, जाव के भ्रमण रूप में ही विष है। विष शब्द जुहोत्यादिगण के 'विष्लृ' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्याप्त होना । शरीर में व्याप्त होकर घातक होने के कारण इसे 'विष' कहते हैं। ऋचादिगण में भी एक विष धातु है जिसका अर्थ है विप्रयोग या वियोग करना । संसार इस लिए भी विष है कि वह हमको शिव से वियुक्त कर देता है । ११. तर्कशास्त्र—हेतुपूर्णयुक्त और विवेचना के नियम को बतलाने वाला शास्त्र । १२. समावेश—यह सम् + आ + विश् से बना है जिसका अर्थ है अच्छे प्रकार से प्रवेश । पारमेश्वर समावेश का अर्थ है परमेश्वर के साथ जीव का एकात्मभाव जिसमें वह अपने को शिव से अभिन्न समझता है । समावेश का अर्थ शिव का जीव में प्रवेश कर उस पर छा जाना भी होता है। चाहे हम शिव का जीव में प्रवेश या जीव का शिव में प्रवेश जो भी अर्थ लें दोनों का परिणाम एक ही है जीव का शिव से एकात्मभाव । १३. शक्तिपात—शक्ति शिव का क्रियात्मक बल है। अतः वह शिव से अभिन्न है। शक्ति से ही शिव पंचकृत्य करता है। शक्तिपात का अर्थ है शक्ति का किसी पर गिरना अर्थात् शिव का अनुग्रह, शिष्य या साधक में गुरु द्वारा या शिव द्वारा आत्मिक बल का उन्मेष ।