प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियाँ १०७ शुद्ध अध्वा अथवा अतिजागतिक अभिव्यक्ति ३. सदाशिवः-- इस तत्त्व में अहन्ता और इच्छा का प्राधान्य रहता है। इदन्ता या विश्व अभी अस्फुट अवस्था में है। इसका दूसरा नाम सादाख्य तत्त्व भी है। इसका परामर्श है 'अहमिदम्' मैं यह (विश्व) हूं। इस अवस्था में 'मैं' और 'विश्व' में कोई भेद नहीं है। अभी विश्व स्फुट हुआ ही नहीं है। सादाख्य का अर्थ है 'सत् आख्या यतः'–वह अवस्था जहाँ सबसे पहले सत्ता का भान होता है। ४ ईश्वर :-इस तत्त्व में अहन्ता और इदन्ता, अहं का ज्ञान और विश्व का आभास दोनों समान रूप से एक साथ ही स्फुट रहता है। इसमें ज्ञान का प्राधान्य है। इसी से प्रनेय, या ज्ञेय स्फुट रहता है। इसका परामर्श है 'इदमहम्'–यह (विश्व) मैं हू । विश्व प्रमेय या वेद्य रूप में रहता है। किन्तु 'अहम्' या 'मैं' से उसका अभेद रहता है। ५. विद्या या शुद्धविद्या या सद्विद्याः--इसमें क्रिया का प्राधान्य है। इसका परामर्श है 'अहमिदं च अथवा इदं च अहं च'। अर्थात् मैं, मैं हूँ और यह (विश्व) भी हू । यह भेदाभेद की अवस्था है अर्थात् भेद होने पर भी उसमें अभेद का बोध बना रहता है। यद्यपि विश्व वेद्य या ज्ञेय रूप में भान होता है, तथापि यह ज्ञान बना रहता है कि यह विश्व मैं ही हूँ। यह मेरा ही रूप है, मुझ से भिन्न नहीं है। इसी से इसे शुद्ध विद्या कहते हैं, क्योंकि अभी विश्व का अपने से भेद नहीं है। शिव से शुद्धविद्या तक पाँच तत्त्व शुद्ध अध्वा कहलाते हैं। क्योंकि अभी तक वेदक और वेद्य, प्रमाता और प्रमेय या ज्ञाता और ज्ञेय एकात्मक हैं अर्थात् अभी तक वेद्य या ज्ञेय अपना ही रूप है और अभी तक पूर्ण रूपेण स्वरूपगोपन नहीं हुआ है। ये पाँचों तत्त्व चित् की सर्वगत अवस्था को व्यक्त करते हैं। यहाँ तक वेद्य वेदक से भिन्न नहीं है; वेदक का वेद्य से अभेद बना हुआ है। अशुद्ध अध्वा अथवा जागतिक अभिव्यक्ति ६. माया-विश्व निर्माणकारी या 'परिमितिकारीतत्त्व' । कभी-कभी यह तत्त्व कंचुकों में सम्मिलित नहीं किया जाता, क्योंकि इसी से कंचुकों का प्रादुर्भाव होता है। माया स्वरूप का गोपन कर देती है और भेद और नानात्व की जननी है।