प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 187 में से
संदर्भ में पढ़ें२७-३१. पंच तन्मात्र जी कि पांच ज्ञानेन्द्रियों की मूल योनि है— १-शब्द तन्मात्र, २-स्पर्श तन्मात्र, ३-रूपतन्मात्र । ४-रस-तन्मात्र, और ५-गन्धतन्मात्र । ३२-३६. पंच महाभूत—आकाश, वायु, अग्नि, आपः (जल) और भूमि या पृथ्वी । १६. परप्रमाता—सर्वोच्च ज्ञाता । प्रमाता का अर्थ है प्र + माता = प्रकृष्ट रूप से—बहुत ही अच्छी तरह माप लेनेवाला अर्थात् जाननेवाला । परमशिव को पर प्रमाता कहते हैं । २०. पराशक्ति—सर्वोच्च शक्ति, मुख्यशक्ति । इसको परा (सर्वोच्च) इसलिए कहते हैं क्योंकि इसकी सहकारी या गौणशक्तियाँ जगत् में व्याप्त होकर भिन्न भिन्न कार्य सम्पन्न करती हैं। शक्ति का अर्थ है शिव की चेतना या शिव चेतना का स्पन्द जो कि शिव से अभिन्न है। शिव की ही अन्तः स्थित अर्थतत्व को बाहर प्रकट करने की उन्मुखता और क्रियाशील अनुग्रह को शक्ति कहते हैं । २१. विमर्श—वि + मृश् । मृश् धातु का अर्थ है स्पर्श करना । मनसे स्पर्श करना । यह इस दर्शन का एक उच्चकोटि का पारिभाषिक शब्द है। परमशिव प्रकाशमात्र नहीं है, उसे अपने चैतन्य की भी चेतना है। विमर्श परम सत् की शुद्ध आत्मचेतनता है। इसी विमर्श या आत्मचेतनता के द्वारा ही सृष्टि, स्थिति और संहार होता रहता है। इस विमर्श की तीन अवस्थाएं होती हैं। बाह्य रूप में अर्थात् विश्व में प्रकट होना (सृष्टि) इस प्रथन या प्रकटन को कायम रखना (स्थिति) और पुनः अपने आप में वापिस आना (संहार) । इन तीनों अवस्थाओं के द्वारा सहज अहम् (मैं या आत्मा) का विस्फुरण होता रहता है। द्रष्टव्य- "इह खलु परमेश्वरः प्रकाशात्मा । प्रकाशश्चविमर्शस्वभावः । विमर्शो नाम-विश्वाकारेण, विश्वप्रकाशनेन, विश्वसंहरणेन अकृत्रिमाहमिति विस्फुरणम्" (पराप्रावेशिकाः पृ० १-२ कश्मीरसंस्कृत ग्रंथ माला ।) परमशिव में समस्त विश्व उसी प्रकार विद्यमान रहता है जिस प्रकार मयूर (मोर) के अण्डे के रस में चित्र-विचित्र पिच्छकलाप (परों का समूह) विद्यमान रहता है। ( मयूराण्डरसन्यायेन ) । विमर्श आत्मचेतना का ही उपन्यास (बाहर प्रस्तुत करना) है, जिससे आत्मचेतना की बाह्याभिव्यक्ति होती है ।