प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ४६. भैरवः- भैरव का अर्थ है भयानक । यह शिव का वह भयानक रूप है जो हमारी दुष्प्रवृत्तियों का समूल उच्छेदन कर देता है । इसका निरुक्त इस प्रकार है 'भैरव' भ, र, व इन तीन अक्षरों से बना है । भ- भरण अर्थात् विश्व की स्थिति का द्योतक है । र-रवण अर्थात् विश्व के संहार का द्योतक है । व-वमन अर्थात् विश्व की सृष्टि का द्योतक है । इस प्रकार भैरव सृष्टि स्थिति और संहार तीनों का द्योतक है । इसको तीन शिर वाला इसलिए कहा है क्योंकि यह अपनी तीन शक्तियाँ परा, परापरा और अपरा । (दे० टि० ४३) का प्रतीक है, अथवा नर, शक्ति, शिव इन तीनों का प्रतीक है । ४७. क्षेमराज ने पहले यह श्लोक कहाँ लिखा है इसका पता नहीं चलता । इस श्लोक का भाव एक विरोधाभास के रूप में रखा गया है । अख्याति (अज्ञान) का क्या भाव हैं ? क्या यह प्रकाश में आती है या नहीं (अर्थात् अनुभूत होती हैं या नहीं ?) यदि अख्याति वह है जो 'न ख्याति' अर्थात् प्रकाश में नहीं आती तब तो अख्याति कुछ है ही नहीं । केवल ख्याति (ज्ञान चित्) बच रही । यदि अख्याति भी प्रकाशित होती है अर्थात् अख्याति भी ख्याति है तब तो और भी ख्याति ही सब कुछ है, अख्याति कुछ नहीं है । ख्याति (चित्) का किसी भी प्रकार से निरास नहीं किया जा सकता । ४८. यह उद्धरण स्पन्दकारिका के द्वितीय निष्यन्द के तृतीय और चतुर्थ श्लोक से लिया गया है । ४६. विकल्प का अर्थ है विशेष या विविध कल्पना, एक विषय या विचार को औरों से पृथक् रूप में देखना या जानना, पृथक् ज्ञान, भिन्न ज्ञान । विकल्पन या विकल्प की क्रिया का अर्थ है- "विशेषेण विविधेन वा कल्पनम्" अर्थात् यह समझना कि यह औरों से विशिष्ट है, पृथक् है, भिन्न है । विकल्पन चित्त की वह क्रिया हैं जिसके द्वारा 'एक' 'दूसरे' से विशिष्ट रूप में देखा या समझा जाता है । व्यष्टिचित्त का यही स्वभाव है कि वह विकल्प करता है, 'एक' को 'दूसरे' से विशिष्ट करता है, भिन्न रूप में देखता है । योगराज ने अभिनवगुप्त के परमार्थसार के ११वें श्लोक में आये हुए विकल्प शब्द पर जो विवृत्ति लिखी है वह बहुत ही उद्बोधक है । वह इस प्रकार है-"विकल्पो हि अन्यापोहलक्षणो द्वयं घटाघटरूपं आक्षिपन् अध- टात् व्यवच्छिन्नं घटं निश्चिनोति" अर्थात् विकल्प का यह लक्षण है कि वह औरों को छुड़ाकर एक को पकड़ता है । यदि घट (घड़ा) को जानना है