प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात प्राथमिक वक्तव्य शैव धर्म कदाचित् संसार का सबसे प्राचीन धर्म है । सर जान मार्शल ने अपनी 'मोहञ्जोदड़ो ऐण्ड दि इण्डस सिविलिजेशन' नामक पुस्तक में लिखा है कि मोहञ्जोदड़ो और हरप्पा की खुदाई से यह पता चलता है कि शैवधर्म का इतिहास ताम्रपाषाणयुग का अथवा उससे भी पूर्व तक का है और इस प्रकार यह संसार का अत्यन्त प्राचीन धर्म है । भारत में इसकी तीन विधाएं दृष्टिगोचर होती हैं—कर्नाटक का वीरशैव, तमिलनाडु का शैव सिद्धान्त और कश्मीर का अद्वैत शैव धर्म । तीनों में कुछ सामान्य लक्षण हैं, किन्तु कुछ विशेष अन्तर भी है । इस ग्रन्थ का विषय केवल कश्मीर का अद्वैत शैव दर्शन हैं । भारत में दर्शन कभी भी केवल बौद्धिक विलास की वस्तु नहीं रहा । भारत के लिए दर्शन केवल चिन्तन-सरणि नहीं है, अपितु जीवन-सरणि है । न तो यह निरर्थक कौतूहल से प्रसूत हुआ है; और न यह एक बौद्धिक व्या- याम मात्र है । यहाँ प्रत्येक दर्शन धर्म है और प्रत्येक धर्म का दार्शनिक आधार है । यहां एक लम्बा उपनेत्रधारी अध्यापक जो अपने छात्रवर्ग को अपने व्याख्यान का सार लिखवा रहा हो दार्शनिक नहीं कहलाता था और न ही वह दार्शनिक समझा जाता था जो अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा बैठा वादों का तन्तुजाल बुन रहा हो । यहां तो दार्शनिक वह माना जाता था जो जीवन के रहस्य को जानने के लिए एक गम्भीर आन्तरिक प्रेरणा से प्रणोदित होता था, जो तीव्र आध्यात्मिक साधना में व्यग्र रहता था और जो अपने जीवन को रूपान्तरित कर प्रकाश का दर्शन करता था । अपने समकालीन जनों के लिए करुणा से प्रेरित होकर, जिस सत्य का वह अनुभव करता था उसे मानव की तार्किक बुद्धि को अवगत कराने का प्रयत्न करता था । इस प्रकार इस देश में दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ । कश्मीर का अद्वैत शैव दर्शन इसी प्रकार का रहा है । शताब्दियों तक वह एक गुह्य सिद्धान्त के रूप में साधक को बतलाया जाता था जिसको उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना पड़ता था और अपने आध्यात्मिक प्रयोग-