भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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( ३० ) है और व्युत्थान में लुप्त हो जाता है। इस दर्शन की धारणा यह है कि वही पूर्ण समावेश है जो व्युत्थानदशा में भी अविचलित रहता है और जिसके द्वारा जगत् केवल मृण्मय नहीं प्रतीत होता, प्रत्युत दिव्यप्रकाश के परिधान से सम- लंकृत दीख पड़ता है। वह सर्वव्यापी चेतना की अभिव्यक्ति और विलास प्रतीत होता है और स्वयं साधक भी यही अनुभव करता है कि मैं भी वही चेतना हूँ। तब जगत् परिहार का विषय नहीं रह जाता प्रत्युत आनन्द का विषय (जगदानन्द) बन जाता है। तब वास्तविक अकृत्रिम अहं-विमर्शका उदय होता है जिसमें जगत् प्रतियोगी की भांति नहीं प्रत्युत अहं की अभिव्यक्ति की भांति प्रतीत होता है । इस दर्शन में जीवनमुक्ति की यही अवधारणा है। जगत् का उदय शिव के शुद्ध अहंविमर्श से होता है। मानव की अवस्था में उस अहंविमर्श का तादात्म्य अन्न-प्राण-मनोमयकोशों से हो जाता है और जगत् उस अहं का सर्वथा प्रतियोगी प्रतीत होता है। मानव का कर्त्तव्य है पुनः उस अहंविमर्श को प्राप्त करना जिसमें अहं और इदं एक ही है। निस्सन्देह यह अवस्था एकाएक नहीं प्राप्त हो सकती। इस दर्शन के अनुसार प्रमाताओं का उच्चावच स्तर है। विवर्तन प्रक्रिया में मानव क्रमशः मायाप्रमाता की अवस्था से ऊपर उठते हुए शिव के शुद्ध अहं-विमर्श की अवस्था को पहुँच जाता है। सामान्य जीव सकल कहलाता है। उसमें कार्म, मायीय और आणव तीनों मल होते हैं। कई जन्मों के अनन्तर जिसमें कि वह भौतिक और मानसिक शक्तियों के वशीभूत होकर नाना प्रकार के कृत्य करता रहता है, वह एक मानसिक व्यथा से ग्रस्त हो उठता है जिसके कारण वह जीवन का 'कहांसे' और 'किधर' जानने का चेष्टा करता है। यह शिव के अनुग्रह की प्रथम अभिव्यक्ति है। यदि वह पर्याप्त रूप से सावधान नहीं रहता और अवाञ्छनीय प्रकार के योग का अभ्यास करता है, तो वह प्रलयाकल हो जा सकता है। प्रलया- कल कार्ममल से मुक्त होता है। उसमें केवल मायीय और आणव मल होता है, किन्तु उसमें न ज्ञान होता है न क्रिया। यह वाञ्छनीय अवस्था नहीं है। प्रलय के समय तो प्रत्येक सकल 'प्रलयाकल' हो जाता है। विज्ञानाकल एक अधिक उच्च अवस्था का साधक है। वह माया से ऊपर उठ गया है, किन्तु शुद्ध विद्या के नीचे है। वह कार्म और मायीयमल से मुक्त

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