प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) (२) नैयायिक सांसारिक दशा में बुद्धि को ही प्रायः आत्मा मान बैठते हैं । मोक्ष के अनन्तर उनका आत्मा शून्यवत् ही हो जाता है । (३) मीमांसक भी बुद्धि को ही आत्मा मान बैठते हैं, क्योंकि वह अहंप्रत्यय को ही आत्मा समझते हैं । (४) बौद्ध ज्ञानसन्तति को आत्मा समझते हैं । अतः उनके दर्शन के अनुसार भी बुद्धि ही आत्मा है । (५) कुछ वेदान्ती प्राण को ही आत्मा समझते है । (६) कुछ अन्य वेदान्ती और माध्यमिक असत् या शून्य को ही आत्मतत्त्व समझते हैं । (७) पांचरात्र के अनुयायी वासुदेव को ही उत्कृष्ट तत्त्व मानते है । (८) सांख्य के अनुयायी विज्ञानाकल की स्थिति को ही परमतत्त्व समझते हैं । (६) कुछ वेदान्ती ईश्वरतत्त्व को ही परमतत्त्व समझते हैं । (१०) वैयाकरण पश्यन्ती या सदाशिव को ही परमतत्त्व मानते हैं । (११) तांत्रिक विश्वोत्तीर्ण आत्मा को परमतत्त्व समझते हैं । (१२) कौल आत्मतत्त्व को विश्वमय मानते हैं । (१३) त्रिक दर्शन के अनुयायी यह मानते हैं कि आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय दोनों है । कुछ लोग इस सूत्र का अर्थ दूसरे ढंग से करते हैं । उनके अनुसार दर्शन का अर्थ ज्ञानसरणि नहीं, ज्ञान है । स्थिति का अर्थ अन्तर्मुखी विश्रान्ति है । 'तद् भूमिकाः' का अर्थ 'चिदानन्दघन की अभिव्यक्ति के उपाय' है । इस अर्थ के अनुसार नील सुखादि का अनुभव शिव या परमतत्त्व के स्वरूप की अभिव्यक्ति का उपाय है । सूत्र ६—जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मलावृत होकर संसारी बन जाता है । इच्छा शक्ति के संकुचित होने पर आणव मल का अविर्भाव होता है जिससे आत्मा जीव होकर अपने को अपूर्ण मानता है । ज्ञानशक्ति के संकोच से मायीय मल का आविर्भाव होता है जिसके कारण भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है । क्रिया शक्ति के संकोच से कार्म मल का आविर्भाव होता है । इस प्रकार शक्ति के संकोच से सर्वकर्तृत्व किंचित्कर्तृत्व ग्रहण कर कला बन जाता है, सर्वज्ञत्व किंचित्ज्ञत्व ग्रहण कर विद्या बन