प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished187 पृष्ठ
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जो मंगल की मूर्ति है उसे नमस्कार । अब (प्रारम्भ होता है) १ प्रत्यभिज्ञाहृदय नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने । चिदानन्दघनस्वात्मपरमार्थविभासिने ॥१॥ शांकरोपनिषत्सारप्रत्यभिज्ञामहोदधेः । क्षेमेणोद्ध्रियते सारः संसारविषशान्तये ॥२॥ (स्वरूप को पहचानने के लिए रहस्यशास्त्र ) उस शिव २ को नमस्कार है जो सतत ३ या बराबर पंचकृत्यों ४ को करता रहता है, जो चिदानन्दघनस्वरूप ५ अपने आत्मा ६ रूपी परमार्थ ७ को (जो कि प्रत्येक का आत्मा है) अवभासित करता है । शंकर ८ सम्बन्धी जो उपनिषद् ९ या रहस्य है उसका सार प्रत्यभिज्ञा है । उस प्रत्यभिज्ञा रूपी महासमुद्र से संसार रूपी १० विष को शान्त करने के लिए सार (श्रेष्ठभाग) क्षेमराज ने निकाल कर (इस ग्रन्थ में) रख दिया है ।