भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

'सप्तपञ्चकानि'-शिवादिपृथिव्यन्तानि पञ्चत्रिंशत्तत्त्वानि 'तत्स्व- भावः'। तथा शिवादि-सकलान्त-प्रमातृसप्तकस्वरूपः; चिदा- नन्देच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तिरूपत्वेऽपि अख्यातिवशात् कला-विद्या-राग- काल-नियतिकञ्चुकवलितत्वात् पञ्चकस्वरूपः । एवं च शिवैकरू- पत्वेन, पञ्चत्रिंशत्तत्त्वमयत्वेन, प्रमातृसप्तकस्वभावत्वेन चिदादिशक्ति- पञ्चकात्मकत्वेन च अयं प्रत्यभिज्ञायमानो मुक्तिदः; अन्यथा तु संसार- हेतुः ॥ ७ ॥ एवं च तद्भूूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः ॥ ८ ॥ सप्त पंचक यह शब्द जो सूत्र में आया है उसे दो प्रकार से समझ सकते हैं ) ( पहला प्रकार वह है जिसमें सप्त और पंचक को एक साथ लेकर समझें ) आत्मा का सात पंचक वाला स्वभाव है । अर्थात् शिव से लेकर पृथिवी तक वह (७ × ५) ३५ तत्वों के स्वभाव वाला है । ( दूसरा प्रकार वह है जिसमें सप्त और पंचक को अलग-अलग लेकर समझें) । वह (आत्मा) शिव से लेकर सकल तक सात प्रमाताओं के स्वरूप वाला है । * यद्यपि वह (आत्मा) १-चित्, २-आनन्द, ३-इच्छा, ४-ज्ञान, ५-क्रिया- स्वरूप वाला है तथापि अख्याति (अज्ञान) वश वह १-कला, २-विद्या, ३-राग, ४-काल, ५-नियति, कंचुकों ६१ (आवरणों) से ग्रस्त हो जाने के कारण (ढक जाने के कारण) पांच स्वरूप वाला (जीव) हो जाता हैं । इस प्रकार पैंतीस तत्त्वमय के रूप में, सात प्रमाताओं के स्वभाव में, चित् इत्यादि पाँच शक्तियों के रूप में जब यह भली भांति पहचान लिया जाता है कि यह एक शिव ही है तब यह ज्ञान मुक्तिदायक होता है । नहीं तो (इनका भिन्न- भिन्न रूप ज्ञान) संसरण (जन्म-मरण) का कारण होता है । और इस प्रकार सूत्र ८-सब दर्शनों की स्थितियाँ उसकी ( आत्मा की ) भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ हैं ।

  • वे सात प्रमाता इस प्रकार है :--शिव प्रमाता, २-मन्त्र महेश्वर, ३-मन्त्रेश्वर, ४-मन्त्र, ५-विज्ञानाकल, ६-प्रलयाकल, ७-सकल ।