प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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इति। एवं च 'बललाभे'—उन्मग्नस्वरूपाश्रयणे' क्षित्यादि-सदा- शिवान्तं 'विश्वम् आत्मसात् करोति'—स्वस्वरूपाभेदेन निर्भासयति। तदुक्तं पूर्वगुरुभिः स्वभाषामयेषु क्रमसूत्रेषु 'यथा वह्निरुद्धोधितो दाह्यं दहति, तथा विषयपाशान् भक्षयेत्' इति। 'न चैवं वक्तव्यम्,—विश्वात्मसात्काररूपा समावेशभूः कादाचित्की। कथम् उपादेया इयं स्यात् इति; यतो देहाद्युन्मज्जननिमज्जनवशेन इदम् अस्याः कादाचित्क- त्वम् इव आभाति। वस्तुतस्तु चितिस्वातंत्र्यावभासि- तदेहाद्युन्मज्जनात् एव कादाचित्कत्वम्। एषा तु सदैव प्रकाशमाना; अन्यथा तत् देहादि अपि न प्रकाशेत। इस प्रकार जब (चिति का) बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् जब कोई अपने उस वास्तविक स्वरूप का आश्रय ग्रहण करता है जो कि अब आविर्भूत हो गया है, तब वह पृथिवी से लेकर सदाशिव तक सारे विश्व को आत्मसात् कर लेता है अर्थात् विश्व को अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में भासित करता है। यही बात पूर्व आचार्यों ने क्रमसूत्र में अपने निराले ढंग से कही है। "जैसे प्रज्वलित आग इन्धन को जला डालती है, वैसे ही साधक को विषय- बन्धनों को आत्मसात कर लेना चाहिए।" ऐसा नहीं कहना चाहिए वह समावेश भूमि जिसमें विश्व का आत्म- सात्कार हो जाता है कभी-कभी ही होती है। तो फिर यह कैसे ग्रहण करने योग्य मानी जा सकती है। (यह शंका ठीक नहीं है)—क्योंकि देह इत्यादि के आविर्भाव और तिरोभाव के कारण ही चिति की यह दशा कभी-कभी होनेवाली (अस्थायी) जैसी लगती है। वस्तुतः समावेशभूमि का कादाचित्कत्व (कभी-कभी होनेवाली अवस्था) देह इत्यादि के आविर्भाव के ही कारण है (जिस देह-इ० को) चिति अपने स्वातन्त्र्य से अवभासित करती है। सच बात तो यह है कि समावेशभूमि सदा प्रकाशमान है। यदि ऐसा न होता, तो देह