प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'आदिकोटिः' हृदयम्, 'अन्तकोटिः' द्वादशान्तः; तयोः प्राणो- ल्लासविश्रान्त्यवसरे 'निभालनं'-चित्तनिवेशनेन परिशीलनम्। यथोक्तं विज्ञानभैरवे 'हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः। अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥' इति। तथा 'यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् । प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥' इति। आदिपदात् उन्मेषदशानिषेवणम् । यथोक्तम् 'उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥' इति स्पन्दे । तथा रमणीयविषयचर्वणादयश्च संगृहीताः । यथोक्तं श्रीविज्ञानभैरवे एव आदि कोटि-हृदय। अन्तकोटि = द्वादश ( बारह अंगुलियों) का अन्तर। निभालन--इन दोनों (हृदय और द्वादशान्त) में प्राण के उमड़ने और समाप्त होने के अवसर पर चित्त को लगाने का अभ्यास। जैसा कि विज्ञान भैरव में कहा है :- "हे सुभगे (हे सुन्दरि) जिसकी इन्द्रियां हृदयाकाश में लीन हो गई हैं, जिसका चित्त हृदयकमल के भीतर प्रविष्ट हो गया है, जो और कुछ नहीं चिन्तन करता है (अर्थात जो एकाग्रचित्त हो गया है), वह परम सौभाग्य को प्राप्त होता है।" (वि० भै० श्लोक ४६) । इसी प्रकार (विज्ञानभैरव में ५१ वें श्लोक में कहा गया है) "जैसे कैसे भी और जहां कहीं भी यदि कोई अपने चित्त को द्वादशान्त में लगावे तो प्रतिक्षण उसकी चित्तवृत्ति क्षीण होती जायगी और थोड़े ही दिनों में वह औरों से विलक्षण हो जायगा ।" आदि शब्द से (अर्थात् सूत्र में जो आदि शब्द है उससे) उन्मेषदशा का अभ्यास (समझना चाहिए)। जैसा कहा है (स्प० का० नि० ३ का० ६) । "उसको उन्मेष १६७ समझना चाहिए; (कोई) स्वयं उसको देख ले (अर्थात् उसका स्वयं अनुभव कर ले)" इसी प्रकार रमणीय विषय का आस्वादन इत्यादि भी 'आदि' पद में संगृहीत है, जैसा कि श्री विज्ञानभैरव में ही कहा है :-