भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

इस पृष्ठ पर कोई मुख्य पाठ मुद्रित नहीं है; केवल पृष्ठ के पीछे का अत्यंत धुंधला (bleed-through/ghosting) प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है।

अतः यह पृष्ठ वस्तुतः रिक्त (Blank Page) है।

शुद्धिपत्र पृष्ठ पंक्ति (ऊपर से) अशुद्ध शुद्ध ४ ४ सिद्दान्त सिद्धान्त ६ ११ प्रत्यभिक्षा प्रत्यभिज्ञा ११ १९ सृष्टि और संसार सृष्टि और संहार १२ ७ अस्फुटत्सात अस्फुटत्वात् १२ २६ वैद्य वेद्य १३ १० अहम अहम् १३ २२ पांच पाँच १४ ४ पांच पाँच १४ २० कंचकों कंचुकों १७ १४ अनपह्नवनवनीयः अनपह्नवनीयः २३ २३ शंकरवेदान्त शांकरवेदान्त २४ ३१ होगा होता ३१ २२ संस्कृति संसृति ३५ ५ प्रभाता प्रमाता ३८ २५ अविर्भाव आविर्भाव ४३ ३ प्रत्याभिज्ञाहृदय प्रत्यभिज्ञाहृदय १ ४५ ८ स्फरति स्फुरति ४७ २४ ज्ञाता का उदय ज्ञान का उदय ५३ २२ अन्यत्र कहा है अन्यत्र कहा है ७ ५७ १४ अनुसप अनुभव ५९ पादटिप्पणी शिवप्रमाता १-शिवप्रमाता ६५ १६ भक्तों की भक्तों को ६५ २२ वह शक्ति वह अपने शक्ति ७० ७ व्यामोहित्वं व्यामोहितत्वं ७५ १७ चिदानन्दघनमय १२६ चिदानन्दघनमय व्यानशक्ति ब्यानशक्ति १२६ ७६ ५ शिप शिव ८१ २४ दृढ़ता ही दृढ़ता हो ८९ २३ चित्तधृत्ति चित्तवृत्ति ९० ११ विस्नार विस्तार ९२ १३ भीतरस्थिति भीतरस्थित

( १४ ) ९६ ८ महामन्व महामन्त्र ९६ २६ इस सत्र में इस सब में १०५ १३ जाव जीव ११० २१ प्रमाण प्रमा ११६ ३० विवृत्ति विवृति १२१ २५ ही पाता हो पाता १२३ २१ माव्या माया १२५ २३ जीव की जीव को १२८ २१ २२१ १२१ १४० ३ 'अ' लेकर 'अ' से लेकर १४० ३० अपने की अपने को १४८ ३ Note No. 167 Note No. 174 १५० १४ प्रभा प्रमा १५१ २१ हारन्ध्र ब्रह्मरन्ध्र

अकारादिक्रम से सूत्रों की अनुक्रमणिका सूत्र सूत्रांक पृष्ठांक आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापनतस्तानि । ११ ६९ चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । ५ ५४ चितिवह्निरवरोहपदेच्छन्नोऽपि मात्रया मेयन्धनं प्लुष्यति । १४ ७७ चितिसंकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचितविश्वमयः । ४ ५१ चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः । १ ४४ चिदानन्दलाभे देहादिषुचेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्ति- दार्ढ्यञ्जीवन्मुक्तिः । १६ ८१ चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृतः संसारी ९ ६५ तत्परिज्ञाने चित्तमेवान्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः । १३ ७६ तथापि तद्वत्पञ्चकृत्यानि करोति । १० ६७ तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् । १२ ७० तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्तावेशात् सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवताचक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवति । २० ९३ तद्भूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः । ८ ५९ तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् । ३ ४९ तन्मयो मायाप्रमाता ६ ५६ बललाभे विश्वमात्मसात्करोति । १५ ७९ मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः । १७ ८२ विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदाद्यन्त-कोटिनिभालनादय इहोपायाः । १८ ८३ स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्तपञ्चकस्वभावः । ७ ५८ समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयोभूयश्चिदैक्यामर्शात् १९ ९१ नित्योदित समाधिलाभः । स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । २ ४८

MOTILAL BANARSIDASS PUBLISHERS 卐 VARANASI

योगप्रदीपिका स्वात्माराम योगी ब्रह्मचारि याज्ञवल्क्य प्रणीत हिन्दी भाष्य सहित श्री आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, आनन्दभैरव आदि हठयोग प्रवर्तक आचार्यों में प्रस्तुत कृति के रचयिता स्वात्माराम योगी का नाम विख्यात है । पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार आत्मदर्शन के लिये राजयोग चरम साधन है । किन्तु राजयोग की प्राप्ति के लिये हठयोग की साधनायें आवश्यक हैं । योगसाधना के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग साधनों में हठयोग का बहिरङ्ग में समावेश हो जाता है । प्रस्तुत पुस्तक चार उपदेशों में विभक्त है । प्रथम उपदेश में वीर, कूर्म आदि योगासनों का विवरण है । द्वितीय उपदेश में प्राणायाम के विविध प्रकार हैं । तृतीय उपदेश में कुण्डलिनी जागरणार्थ महामुद्राओं की विधि है । चतुर्थ उपदेश में शांभवी, उन्मनी, खेचरी आदि महामुद्राओं के साथ-साथ नादावस्था आदि योग-सामग्री का संग्रह है । मूल्य रु० ३.५० भारतीय दर्शनशास्त्र—न्याय वैशेषिक डा० धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री प्रस्तुत कृति में भारतीय दर्शनशास्त्र के और विशेषतः न्याय-वैशेषिक शास्त्र के इतिहास और सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन किया गया है । इस पुस्तक के तीन प्रकरण हैं । पहले प्रकरण में भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय के अन्तर्गत वैदिक, बौद्ध, जैन, चार्वाक, मीमांसा, वेदान्त और सांख्य दर्शन के सिद्धान्तों का वर्णन है । दूसरे प्रकरण में प्रारम्भिक युग से लेकर नवीन युग तक न्याय-वैशेषिक के इतिहास का विवेचन है । तीसरे प्रकरण में न्याय वैशेषिक दर्शन सिद्धान्तों का निरूपण है । कृति आलोचनात्मक है; दर्शन शास्त्र के छात्रों के लिये अत्यन्त उपयोगी है । मूल्य रु० ३.०० भारतीय दर्शन की भूमिका डा० रामचन्द्र पाण्डेय इस कृति में मनीषी लेखक ने भारतीय दर्शन के प्रारम्भिक छात्रों के लिये भारतीय दर्शन शास्त्र का सरल और सुगम विवेचन प्रस्तुत किया है । यह कृति उन लोगों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है जो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों से पूर्व परिचित नहीं हैं । लेखक ने पन्द्रह अध्यायों में भारतीय दर्शन के उद्गम से लेकर धर्मनिरपेक्षता और प्रजातन्त्र के आधुनिक सिद्धान्तों तक का स्पष्ट शैली में दार्शनिक समीक्षण प्रस्तुत करते हुए यह दिखलाया है कि मूल रूप में भारतीय दर्शन स्वतंत्रता की खोज है और इसका चरम लक्ष्य “धर्मों का गणतन्त्र” स्थापित करना है । मूल्य रु० १०.०० मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली :: पटना :: वाराणसी