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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

MOTILAL BANARSIDASS PUBLISHERS 卐 VARANASI

योगप्रदीपिका स्वात्माराम योगी ब्रह्मचारि याज्ञवल्क्य प्रणीत हिन्दी भाष्य सहित श्री आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, आनन्दभैरव आदि हठयोग प्रवर्तक आचार्यों में प्रस्तुत कृति के रचयिता स्वात्माराम योगी का नाम विख्यात है । पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार आत्मदर्शन के लिये राजयोग चरम साधन है । किन्तु राजयोग की प्राप्ति के लिये हठयोग की साधनायें आवश्यक हैं । योगसाधना के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग साधनों में हठयोग का बहिरङ्ग में समावेश हो जाता है । प्रस्तुत पुस्तक चार उपदेशों में विभक्त है । प्रथम उपदेश में वीर, कूर्म आदि योगासनों का विवरण है । द्वितीय उपदेश में प्राणायाम के विविध प्रकार हैं । तृतीय उपदेश में कुण्डलिनी जागरणार्थ महामुद्राओं की विधि है । चतुर्थ उपदेश में शांभवी, उन्मनी, खेचरी आदि महामुद्राओं के साथ-साथ नादावस्था आदि योग-सामग्री का संग्रह है । मूल्य रु० ३.५० भारतीय दर्शनशास्त्र—न्याय वैशेषिक डा० धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री प्रस्तुत कृति में भारतीय दर्शनशास्त्र के और विशेषतः न्याय-वैशेषिक शास्त्र के इतिहास और सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन किया गया है । इस पुस्तक के तीन प्रकरण हैं । पहले प्रकरण में भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय के अन्तर्गत वैदिक, बौद्ध, जैन, चार्वाक, मीमांसा, वेदान्त और सांख्य दर्शन के सिद्धान्तों का वर्णन है । दूसरे प्रकरण में प्रारम्भिक युग से लेकर नवीन युग तक न्याय-वैशेषिक के इतिहास का विवेचन है । तीसरे प्रकरण में न्याय वैशेषिक दर्शन सिद्धान्तों का निरूपण है । कृति आलोचनात्मक है; दर्शन शास्त्र के छात्रों के लिये अत्यन्त उपयोगी है । मूल्य रु० ३.०० भारतीय दर्शन की भूमिका डा० रामचन्द्र पाण्डेय इस कृति में मनीषी लेखक ने भारतीय दर्शन के प्रारम्भिक छात्रों के लिये भारतीय दर्शन शास्त्र का सरल और सुगम विवेचन प्रस्तुत किया है । यह कृति उन लोगों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है जो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों से पूर्व परिचित नहीं हैं । लेखक ने पन्द्रह अध्यायों में भारतीय दर्शन के उद्गम से लेकर धर्मनिरपेक्षता और प्रजातन्त्र के आधुनिक सिद्धान्तों तक का स्पष्ट शैली में दार्शनिक समीक्षण प्रस्तुत करते हुए यह दिखलाया है कि मूल रूप में भारतीय दर्शन स्वतंत्रता की खोज है और इसका चरम लक्ष्य “धर्मों का गणतन्त्र” स्थापित करना है । मूल्य रु० १०.०० मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली :: पटना :: वाराणसी