भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व सुभट भाट संग थान । चित्त चारन चतुरंगम ॥ जहँ तहँ लच्छि निवास । सु बसि विलसंत सुरंगम ॥ सुनियै न श्रवन पर चक्र भय । सुजस सकल जंपै जगत ॥ मानिक राज कुल उद्धरन । सीम पलन जहँ तहँ पगत ॥ छं० ॥ ई८० ॥ रु० ॥ ३४१ ॥ ॥ अनंगपालजी का अपनी दो पुत्रियों में से सुन्दरी बिजैपालजी को और कमला सोमेश्वर जी को प्रदान करना ॥ दूहा ॥ अनग पाल पुत्ती उभय । इक दीनी विजपाल ॥ इक दीनी सोमेस कौं । बीज बवन कलि काल * ॥ छं० ॥ ई८१ ॥ रु० ॥ ३४२ ॥ एक नाम सुर सुंदरी । अनि वर कमला नाम ॥ दरसन सुर नर दुल्भची । मनौं सु कलिका काम ॥ छं० ॥ ई८२ ॥ रु० ॥ ३४३ ॥ ॥ जिस दिन सोमेस का विवाह हुआ उस दिन क्या २ हुआ ॥ कवित्त ॥ ज दिन व्याहि सोमेस । त दिन अमरन मन उदित ॥ त दिन बीर बेताल । काल कलहागम कुदित ॥ त दिन अवनि उमहीय । पुच इक्चि भार उतारै ॥ छत्र तेज छित छज्जि । देव दानव पुंतारै ॥ ३४१ पाठान्तरः—तपे । चहुआन । चहुवांन । मुझ । मुंछ । अच्छ । मुष । सुभट घाट संग भाट चित्त चोरन चतुरंगम । जहां तहां । जिहां तिहां । जह । तह । लछि । वशि । सुनीयै । जंपे । मांनिक । कुल । प्रलन । जिहां तहां । जह । तह ॥ ३४२-३ पाठान्तरः—अनंगपाल । दिनी । विजपाल । बिजैचंद । सोमेस । चिप वपुत्त । चाल । दंड ॥ ३४२ ॥ नांम । सूर सुंदरी । सुदरी । वीच कमला वर नांम । वै । अनि वर मलया नांम । दुल । मनौं । सुं । कांम ॥ ३४३ ॥

  • चंद कवि का यह वाक्य "बीज बवन कलि काल" हमारे पाठकों के ध्यान देकर यह समझने योग्य है कि यद्यपि चंद सोमेश्वर जी के घर का कविराज था परंतु वह कैसा यथार्थ वक्ता था । क्या आज भी कोई कवि अथवा कविराज ऐसा स्पष्ट कह अथवा लिख सक्ता है ?