पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ उपसंहारिणी टिप्पणी । गीत ॥ मत काची तोन्ह रखियो घानी नान्द कहंगी आँत रासा गुर राख, पक्कावा, मत काचा । इत्यादि ॥ १ ॥ जिण लोगन की रास उठेगी तोन्ह के खाक उठावेगा, हल जोत, नहीं पछतावेगा । इत्यादि ॥ २ ॥ २ यद्यपि इस महाकाव्य का केवल नाम सुनते ही उस का विषय यह प्रतीत होने लगता है कि उस में पृथ्वीराजजी चौहान के जन्म से लेकर मरण तक के ही सब चरित्र वर्णन किये गये हैं; [विषय] परंतु उस के गर्भित वृत्तों की परीक्षा करने से जानने में आता है कि महा कवि चंद ने उस में पृथ्वीराजजी के चरित्रों के साथ ही उन के सब समकालीन शूर, सामंत, आधीन राजा इष्ट मित्र और सगे संबन्धी और सहायक यावदार्य राजकुलों के भी कुछ न कुछ चरित्र और शौर्य वर्णन किये हैं । अतएव यह कदापि नहीं समझा जा सक्ता कि यह महाकाव्य पृथ्वीराजजी चौहान के नायक होने के कारण से केवल चौहानों की ही बापौती का ग्रंथ है किन्तु वह वास्तव में यावदार्य राजकुलों का सर्वस्व है । देखो, पृथ्वीराजजी से लेकर जिन २ शूर वीरों के चरित्र उस में वर्णन किये गये हैं उन सब की विद्यमान संतान वर्तमान काल की हमारी श्रीमती भारत-राजराजेश्वरी विक्टोरिया के सिंहासन के चारों ओर उपस्थित होकर अपनी २ प्रतिष्ठा के अनुसार तन मन और धन के द्वारा परम राज-भक्ति को प्रकाश कर रहे हैं और श्रीमती के प्रस्वेद के साथ मानो अपना रक्त तक बहाने को प्रस्तुत खड़े हैं । क्या पृथ्वीराज- जी के एक बड़े शूर वीर सामंत पञ्जनजी के वंश में श्रीमहाराज साहब जयपुर और उनके राज वंशीय सरदार नहीं हैं ? क्या पृथ्वीराजजी के सगे संबन्धी जयचंदजी के वंशज श्रीमहाराज साहब जोधपुर और कृष्णगढ़ और उनके भाई बेटे नहीं हैं? क्या पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और परम शूर धीर संहायक रावल समरसीजी की कुलीन संतान में श्रीमहाराज साहब नैपाल, श्रीमहाराणाजी साहब उदयपुर, श्रीदरबार डूंगरपुर और प्रतापगढ़ अपने २ राजवंशी उमराव और सरदारों के सहित नहीं हैं? क्या चौहानजी के अनेक वंशज बूँदी, कोटा सिरोही, नीमराणा, भदावर, बेदला, कोठारिया, और पारसोली आदि के राजा महाराजा और सरदारों को आज हम अपनी आंखों से नहीं देखते हैं ? इसी तरह अन्य सब की विद्यमान संतानों को भी हमारे पाठक स्वयम् विचार देखें और इस थोड़े में ही बहुत कर के समझ लें कि इस महाकाव्य का विषय बारहवें शतक के यावदार्य राजकुलों के संवलित चरित्रों से परम विभूषित है ॥ ३ इस पृथ्वीराज रासे को जो हम अपने लेखों में महाकाव्य कर के लिखते हैं वह कुछ [काव्य] अन्यथा और आश्चर्यदायक नहीं है किन्तु साहित्यदर्पण में महाकाव्य का जो नीचे लिखा हुआ लक्षण लिखा है उस से वह विशेषांस में मिलता हुआ है:- सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्त गुणान्वितः ॥ एकवंशभवा भूपाः कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद्वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् । आदौ नमस्क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा ॥ क्वचिन्निन्दा खलादीनां सताञ्च गुणकीर्त्तनम् । एकवृत्तमयैः पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकैः ॥ नातिस्वल्पा नातिदीर्घाः सर्गा अष्टाधिका इह । नानावृत्तमयः क्वापि सर्गः कश्चन दृश्यते ॥