पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ उपसंहारिणी टिप्पण। तक के हिन्दी भाषा के सर्व प्रकार के काव्यों का एक अमूल्य संग्रह हमारे लिये प्रस्तुत कर के हमारी हिन्दी भाषा को अति धनाढ्यकर गया है। क्या यह बात पक्षपात रहित विद्वानों को अति आश्चर्य और अट्टाट्टहास कराने वाली नहीं है, कि हम इस महाकाव्य को अभी तक बहुत ही अच्छी तरह से पढ़ पढ़ा और समझ समझा तो सक्ते ही नहीं और न इस महाकाव्य में यूनी- वर्सिटी University की परीक्षा की शैली के अनुसार परीक्षा देकर उत्तीर्ण हो सक्ते हैं किन्तु उसको दोष देकर विध्वंस करने को तो हम सब से आगे आखड़े होने को प्रसन्नतापूर्वक तयार हैं? निदान किसी कवि के कहे अनुसार जो जिस के गुण को नहीं जानता वह उस की निन्दा निरंतर करता है:-“न वेत्ति, यो यस्य गुणप्रकर्षं स तस्य निन्दां सततं करोति। यथा किराती करिकुंभजाता मुक्ताः परित्यज्य विभाति गुंजाः” ॥ जैसे इस महाकाव्य का काव्य अनेक प्रकार के काव्यों का एक संवलित् काव्य है वैसे ही उसकी भाषा भी उसके ग्रंथकर्त्ता के समय तक की अनेक प्रकार की प्राचीन हिन्दी भाषाओं की एक अति संवलित् भाषा | हिन्दीभाषा है। यदि किसी को इसमें कुछ संदेह हो तो वह इस आदि पर्व्व को ही ध्यान देकर पढ़ देखे कि उसके किसी छंद की तो कैसी भाषा है और किसी की कैसी। क्या विद्वानों से यह बात छिपी हुई है कि भाषा और काव्य का नित्य-संबन्ध नहीं है? जब कि उन में नित्य-संबन्ध का होना यथार्थ है तो फिर क्या प्रत्येक का अपने २ अनेक प्रकारों से संवलित् होना भी स्वतः सिद्ध नहीं है? इस महाकाव्य की भाषा के योज को वह विद्वान भले प्रकार से जान सक्ते हैं कि जो वर्त्तमान समय में फिलौलोजिस्ट Philologists अर्थात् शब्दोत्पत्तिविद्याज्ञ कहलाते हैं। और वैसे तो हमारे पढ़ने में वर्त्तमान समय के ऐसे २ सहसा सिद्धान्त कर लेने वाले विद्वानों के भी लेख आये हैं कि जिनों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वाक्य भी कहा है, कि इस महाकाव्य के महाकवि को अनुस्वार और विसर्ग तक के प्रयोग करने का बोध नहीं था। और विद्वान भलेई ऐसा कहने में सम्मत हों परंतु हमारे मुख से तो इस महाकाव्य के काव्य को देखते हुए ऐसा सुन कर वारंवार यही निकलता है कि-त्राहि गोविन्द! त्राहि गोविन्द!! ग्रंथकर्त्ता ने इस ग्रंथ को जिस भाषा में लिखा है वह उसने स्वयम् ही इस आदि पर्व्वके रूपक ३९ में स्पष्ट कह दिया है और जैसा उसने कहा है वैसी ही भाषा हम इस महाकाव्य की पाते भी है। फिर आश्चर्य क्या है? वह यही है-कि न तो हम इस ग्रंथ को आदि से लेकर अंत पर्य्यंत पढ़ते हैं, न समझते हैं, न कवि के अभिप्राय को लक्ष में लाते हैं, न यह विचारते हैं कि बड़े २ विद्वान कि जिन के वचन पर अनेक मनुष्य विश्वास करते हैं उनके सिर पर कुछ सम्मति देते समय बड़ी भारी जिम्मेदारी अर्थात् अनुयोज्यता का बोझ भी रक्खा हुआ है कि नहीं-किन्तु, जो मन में आया वही हम लिख डालते हैं; क्योंकि न तो चंद कवि, न पृथ्वीराजजी चौहान, और न रावल समरसीजी हम से हमारे ऐसा कहने के लिये अब लड़ने को आ सक्ते हैं, और न किसी क्षीर-नीर का सा न्याय करने वाले विद्वान का हमको डर है। देखो, हमने हमारी प्रथम टिप्पण में ही कह दिया है कि इस महाकाव्य की हिन्दी भाषा तीन प्रकार की है। प्रथम षट्- भाषा-और-कुरान-की भाषा-की-योनिवाली दूसरें षट्-भाषा-और-कुरान-की-भाषा-के- सम, और तीसरे देशी-प्रसिद्ध। इसके अतिरिक्त विद्वानों को इस महाकाव्य की भाषा की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से ज्ञात होगा कि चंद कवि ने साहित्यदर्पण में लिखे हुए भाषा के प्रयोग के निम्न लिखित नियमों का भी अपने निज विचार और शैली के संस्कार सहित इस महाकाव्य के रचने में कुछ अनुकरण किया है:-