पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 470 में से
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· २०० पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय २० धरे रूप जेते तिते सर्व जानों । लगै वार कहते न ताथे वषांनों ॥ अबै आइ प्रह्लाद जो होइ ठाढौ । जिनं हेत कीनों इसौ रूप गाढौ ॥ १९५ ॥ इहै बत्त ब्रह्मादि के चित्त आई । सुतौ जाइ प्रह्लाद कौं कै सुनाई ॥ छं० ॥ १९६ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ दूहा ॥ सुनत वचन प्रह्लाद गय । श्री नरसिंघ के पास ॥ सुति जुति सौं ठाढौ रह्यौ । फुल्लौ नहीं ककु सास ॥ छं० ॥ १९७ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ सीस नाइ कर जोरि तब । रह्यौ सनमुख चाहि ॥ क्रिपा दृष्टि देख्यौ हरी । भगत वच्छल प्रभु आचि ॥ छं० ॥ १९८ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ ॥ वेली भुजंग ॥ क्रिपा दिष्ट दिष्यौ सु ठट्ठौ निनारौ । सु तौ प्रान कै प्रान तें अति प्यारौ ॥ लयौ लाइ छाती धर्यौ जंघ दोसं । दियौ अध्य मध्यं कियौ दूरि दोसं ॥ १९९ ॥ चुम्यौ मुख नैनं प्रह्लाद केरै । जरा मृत्यु भै दूर दोसं न नेरै ॥ भई बुधि र्निमल महा सुद्ध बानी । तवै अस्तुतं ऋन्न प्रह्लाद ठानी ॥ २०० ॥ तायै । बिशेष्यो । बिसिख्यो । धरै । जैतै । तितै तंतै । सरव । सर्व्वे । जानौ । झांनीं । लगें । बार । कहतै । कहतैं । तायै । बषानु । वषानाँ । अबैं । आस । आई । आय । प्रहलाद । जौ । हौई । टढौ । ठंढौ । तिनं । हेन । कीनौ । गढौ । इहि । इहैं । वत । चित । कै । सुठौ । जाय । प्रहलाद । कौ । कुं। कहिं। ककहि । कह ॥** इस रूपक की पहिली पंक्ति के खाली स्थान में हमारे पास की सब पुस्तकों में - "बंदे वरुन हारे" - यह अशुद्ध पाठ है। इस को शोधने को कोई प्रा- माणिक आधार हम को अभी नहीं मिला और यही दशा अंत की पंक्ति, की भी है अतएव वह खाली प्रकाश कर दियो गई हैं कि विद्वान लोग विचार कर पाठ को निश्चय करें । हमारी सम्मति में तो इन का पाठ हमारे पास की पुस्तकों से भी पुरानी पुस्तकों के मिलने पर ठीक २ शुद्धना संभावित है । इस की अंत की तुक भर का पाठ बूंदीवाली पुस्तक में- 'सुनत प्रह्लाद इह बात चल्यो । रहै पछ ब्रह्मादि निज गौ इक्कलै'; - सं० १७१० वाली में - "सुनिन हत्ति प्रहलाद इह बात चल्यौ ॥ दहे पछ ब्रह्मान्दि निज गौ इक्कलौ"; - सं० १८५६ वाली में - "सुनत हेत प्रहल्हाद इहै बात चल्ल्यौ ॥ रहे पछ ब्रह्मादि निज गौ इक्कल्यौ"; - और सं० १६४५ वाली में इस का पाठ संवत् १७१० के सदृश ही है ॥ ३७-३८ पाठान्तर :- दोहा । सनत । । पदलद गौ । श्रीनरसिंघ । श्रीनृसिंह । कै । युत । सौं । ठठौ । ठाठौ । फुंल्यौ कुस्र्यौ ॥ शीश । नांइ । जोरि । सनमुख । चाहिं । क्रियादिष्ट । क्रियादृष्ट । क्रियाद्रिष्ट । दिष्यौ । संही ॥ ३९ पाठान्तर :- छंद भुजंगी प्रयात । द्रष्टि । दृष्टि । ठठो । ठठौ । ठट्ठो । प्रांन । कै । प्रान तै । अति । पियारो । लाय । कोस । घमथं । सयं । मन्यं । कीयौ । दोसं । चुम्यो । चुम्यो । सुष । नैनं । नैनं । प्रहलाद । कैरो । मृत्य । दूरि । दौस । हौसं । नैरो बूंदीवाली में - भंयं भइ बुधि निर्मल उन्नु ही अ । आय बोल महा सुद्ध बानी - निर्मल । बांनी । तबैं । अस्तुतं । अस्तुति ।