भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 470 में से

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पृष्ठ 213

२०२ पृथ्वीराजरासौ। [दसम समय २२ वसुद्देव गेहं गच्छो कृष्ण वासं। छते दुष्ट सर्वं कियौ कंस नासं ॥ करे जय्य जीयं धरा भ्रमं सुद्धं। प्रगय्यौ कली काल अवतार बुद्धं ॥ २१० ॥ . जुगं अंत सो सत्ति व्है हैं कलंकी। इदँ बात सांची सदा देव अंकी ॥ जिते सैल सुर हेति सुरपत्ति कीने। तिते सेस गन्नेस जाच्चैं न चीने ॥ २११ ॥ सबै दुष्ट भंजे सु सेवक् उंगारे। करे काम निज धाम नरहर पधारै ॥ छं० ॥ २१२ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ कवित्त ॥ पधारे निज धाम । काम सुर सेव किए सब ॥ जुग जुग सब जन हेत । लिए अवतार तबहि तब ॥ निकसे थंभ विदारि । हने हिरनंक्स दानव ॥ प्रहह्लाद उद्धार । कियौ पूरन पद जाह्नव् ॥ श्री नृसिंहदेव समरंत जन । कलि कलंक दुषन हरन ॥ बज्रिरूप सरूप अनूप किय । श्रीनृसिंह तेरे सरन् ॥ छं० ॥ २१३ ॥ रु० ॥ ४० ॥ ॥ वामनावतार की कथा ॥ दूहा ॥ बहुत काल धरि सुष कियौ । सब देवादिक रिष्ष ॥ पाछै बलि प्रगयौ बली । किये सत्त जिन मष ॥ छं० ॥ २१४ ॥ रु० ॥ ४१ ॥ तब इंद्रासन डग मग्यौ । जेम तुलाकी डंड ॥ सुर सुरपति आंकंपि भय । जांचि कहां इम खंड ॥ छं० ॥ २१५ ॥ रु० ॥ ४२ ॥ जाइ जगाए श्रीपती । बलि असुर अनपार ॥ तब सु पधारे नरहरी । धरि वामन अवतार ॥ छं० ॥ २१६ ॥ रु० ॥ ४३ ॥ गवन। कुभंकश। सहार। संहारं। वसुदेव। वसुदेव। गेह। गेहं। गृछो। यह्यो। कृष्णावासं। छते। सरब। कोयौ। कंस। करै। भ्रम। बुद्धिं। बुधं। जुग। सो। सति। वै है। व्है हे। यहै। यहैं। साची। देव। जितैं। जिते। शैलसुर। सुलसुर। है त। हे त। सुरपति। कीनै। तितै। सैसं। गंनेस। जाचै। चिन्है। चीन्हे। दुष्टं। भंजै। सैवक। उधारै। करै काम। धांम। पधारै ॥ ४० पाठान्तर :-पधारे। पधारै। धांम। कांम। सेव। कीए। युग। युग। हैत। लीए। बहि तब। निकसै। हनै। हिरणांक्स। प्रह्लादै। प्रह्लादै। उधारि। कीयौ। बूंदीवाली में- नरहंसुदेव-सं० १७५० में-नरहसु देख-दुषन। रुप। सरू। अन्रुप। श्रीनृसिंघ। तैर। शरन ॥ ४१-४३ पाठान्तर :-बहत। सुष। कीयौ। सम। ऋषि। रिषि। पाछे। पाछैं। बली बल। बूंदीवाली में-वरि कीए संित जिंत जिंमन मख-कीए। सित। मष ॥ ४१ ॥ इंद्रासन। जैन। आकंप। जाहि। कुंडि ॥ ४२ ॥ जाय। पधारै। नरहीरी ॥ ४३ ॥

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