पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १८ पृथ्वीराज का उत्तर देना कि हम तयार हैं जब चाहै आओ ॥ सुनिय राज चहुआन वर । दिय कग्गद फिरि तेह ॥ जब तुम मंगौ बैर वर । तब हम बैर सुदेंच ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रु० ६८ ॥ भीम का चढ़ाई के लिये तय्यार होना पर सरदारों के कहने से वर्षा ऋतु भर ठहर जाना ॥ कवित्त ॥ बाँचि कग्गद चालुक्क । रोस लग्यौ अयान कह ॥ करो सेन सब एक । चलो अजमेर देस रह ॥ तब कह्यो बीर परधान । मास पावस्स रहैं घर ॥ करि कातिग घन कटक । छनै चहुआन सोम बर ॥ सुनि राज अप्प मन्यौ सुद्धिय । उत्तरु सब जन अवर नर ॥ उपसम्म रोस चालुक्क नृप । षिन षिन वित्तिय जेम थिर ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रु० ॥ ६९ ॥ उपसंहार का कथन ॥ दूहा ॥ रहै राज अजमेर मधि । संभरेस चहुआन ॥ निसि दिन यौँ क्रीला करै । ज्यौं अवतार सुकान्ह ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ७० ॥ इति श्री कवि चन्द विरचिते पृथिराजरासके कन्हाष्षपट्ट बन्धनं नाम पञ्चम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ५ ॥ ६८ पाठान्तर-कग्गर । मगौ ॥ ६९ पाठान्तर-बंचि । कग्गर । लगौ । अयासकह । अयासकहि । रहि । प्रधान । मांस । पावस । कात्तिक । मन्यौ । उपसंमि । वित्तोय ॥ ७० पाठान्तर-चहुवांन । यों । ज्यां ॥