पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो : ३२३ तो सम न और तिहु लोक में । नह सह नाटिकक नर ॥ संसार पार वोद्दिय समर । तोहि सात देवी सुबर ॥ छंदं ॥ १४८ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥ दूहा ॥ सुनि आनंद्यौ चंद चित । कीन संत्त आरंभ ॥ जप्प जाप छवि होम सब । लग्ग्यौ कज्ज असंम ॥ छंदं ॥ १४९ ॥ रू० ॥ ६७ ॥ वीरों का प्रगट होना ॥ गाथा ॥ किय जप जाप सुछोमं । आए वीर धीर आतुरयं ॥ गज्जै गयन गभीरं । भय भै भीत सोर आघातं ॥ छंदं ॥ १५० ॥ रू० ॥ ६८ ॥ छंद भुजंगी ॥ धसंकी धरा धंम धंम्मै धरक्की । कठं पिठ कंमठ्ठ कठ्ठे करक्की ॥ डिग्गै अड्डिगं सो दिगंपाल दस्सं । तरक्कै चकै मुनि जंनं तपस्सं ॥१५१॥ अरक्कै सुवाजं सु वाजं विछुट्ठै । तरक्कैक एकं उलट्टै सुलट्टै ॥ इसो आगमं भै सुबावन्न वीरं । कंपे काइरं धीर रयौ सुधीरं ॥ छंदं ॥ १५२ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम इन को बुलाना ठीक नहीं हुआ । दूहा ॥ सुनिअ घात डर वीर कौ, चमकै चित सामन्त इन आकर्षै कज्ज बिन, किनौं अप्प अमन्त ॥ छंदं ॥ १५३ ॥ रू० ॥ ७० ॥ ६६ पाठान्तर-कहै । कुंवर । प्रथीराज । चरचा । चरचि । सतिय । दमहिं । घोरनि । धोरानं । कजि । पाबहि । सामंत । तिहुं । मैं । नट । भट । नाटिक्र ॥ ६७ पाठान्तर-आनंद्यो । मंत्र । जप । सम । लगे । कज ॥ ६८ पाठान्तर-गाहा । स । गजे ॥ ६६ पाठान्तर-धम्मकी । धम । धम्मै । धम्मे । धम्मैं । धरकी । कमठ । कठे । फरकी । डिगै । डिगे । अडिगं । द्विगंपालं । दसं । तरके । तरकैं । चक्रे । मुनि । मुनि । जनं । तपसं ॥ १५१ ॥ भरके । बिखुटे । तरंकैक । उलटे । सुलटे । इसो । धीरं । कंपे । कंपैं । कायरं स ॥ १५२ ॥ ७० पाठान्तर-सु आघात । चमके । कज । किनौं ॥