पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १० दूहा ॥ तात बरज्यौ बत्त बहु, एक न आवै दाइ ॥ उत पृथिराज नरिंद ने, सज्ज्यो सेन सुभाइ ॥ छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ ३२ ॥ सेना का वर्णन ॥ लघुनाराच ॥ हय ग्गयं सजे अरं । निसांन बज्जि दूभरं ॥ नफेरि बीर बज्जई । मृदंग झंझरी गई ॥ छं० ॥ ३५ ॥ सुनंत ईस रज्जई । तनीस राग सज्जई ॥ सुभेरि झुंकयं घनं । श्रवन्न फुट्टि झंरूनं ॥ छं० ॥ ३६ ॥ नरह नाद रिक्कयं । चुसट्ठ ताल दिज्जयं* ॥ तुरंग पंति चल्लयं । मनौं जलद्द हल्लयं ॥ छं० ॥ ३७ ॥ तरप्पि तेज तामसी । मनौं कि नह वामसी ॥ झलक्कि मंत दंतयं । मनौं किं बीज पंतयं ॥ छं० ॥ ३८ ॥ जेर जरायं बंगरी । मनौं चमक विज्जुरी* ॥ सिरीसु खोभ जग्गयं । कि भान मेघ उग्गयं ॥ छं० ॥ ३९ ॥ श्रवंत खोभ दानयं । झरंत मेघ जानयं ॥ उपंम और दुत्तियं । षिलाव राहु पुत्तयं ॥ छं० ॥ ४० ॥ उपंम तीय उड्डरं । कि मिच कज्जलं गिरं ॥ जु बैरषं विराजची । वसंत वृष लाजची ॥ छं० ॥ ४१ ॥ दुरंत चौर सीसयं । गिरं कि गंग दीसयं ॥ दुती उपंम लग्गयं । कि बह्लं कि बग्गयं ॥ छं० ॥ ४२ ॥ जु घूघरं घमक्कयं । कि दादुरं सु भद्यं ॥ दुती उपंम खेलयं । सुचाग वाम केलयं ॥ छं० ॥ ४३ ॥ ३२ पाठान्तर—दाय । पृथीराजनें । सुभाय ॥ ३३ पाठान्तर-छंद लघुनाराज वा नराजा । हयगयं । निसांन । दुभरं । बजई ॥ ३५ ॥ रजई । सजई । बजई । नफेरि । श्रवन ॥ ३६ ॥ नारद नरद रिक्षयं । चौसट्ट । * यह दूसरा पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है । चुलयं । मनों । जलद । हलयं ॥ ३७ ॥ तरपि । तांमसी । मनों । वांमसी । भालकि । मनों । लभयंतयं ॥ ३८ ॥ * ये दोनों पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं । ससोभ । जगयं । भांन । उगियं ॥ ३९ ॥ दानयं । जानयं । दुतीयं बिलावै । पुत्तियं ॥ ४० ॥ उपंम । कजलं । बृछ ॥ ४१ ॥ चोंर ॥ ४२ ॥ घुघरं । घमघमं । ददुरं । भदयं । उपम ॥ ४३ ॥