पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ गाहा ॥ पय सव्वरी सुभत्तौ । एकंत्तौ कनय राय सोयंसी ॥ कर कंसी गुज्जरीय । रव्वरियं नैव जीवंति ॥ छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥ सत्त खनै आवासं । मच्चिलानं मह सह नूपरया ॥ सतफल बज्जुज पयसा । पब्बरियं नैव चाखंति ॥ छं० ॥ ४४ ॥ रु० ॥ १७ ॥ रब्बरियं रस संदं । क्यूं पुज्जति साध अमियेन ॥ उकति जुगत्तिय ग्रंथं । नथिकत्थ कवि कत्थिय तेन ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ १८ ॥ याते वसंत मासे । कोकिल झंकार अंब वन करयं ॥ बर बब्बूर विरषं । कपोतयं नैव कलयंति ॥ छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ १९ ॥ सहसं किरन सुआज । उगि आदित्य गमय अंधारं ॥ खद्यं उमा न सारो । षोडसयं नैव खलकंति ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २० ॥ कज्जल मद्धि कस्तूरी । रानी रेहंत नयन श्रंगारं ॥ कां मसि घसि कुंभारी । किं नयने नैव अंजंति ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रु० ॥ २१ ॥ ईस सीस असमानं । सुर सुरी सलिल तिष्ट नित्यनं ॥ पुनि गलत्ती पूजारा । गडुवा नैव ढालंति ॥ छं० ॥ ४९ ॥ रु० ॥ २२ ॥ १६–२२ गाहा छंद का लक्षण यह है :— गाहा पहिले बारह । दूजै अठारहै कला राजै ॥ तीजै बारह धारहु । पंद्रह चौथे तहां छाजै ॥ इन गाहा छंदों में अशुद्ध पाठान्तर यह हैं :— सनफल, क्यूपने, बंबू, रवि, रब्धं, नतय, सुरीस, लिल, और फुनि ॥ बाईसमें गाहा के “ईस सीस असमानं” में जो असमानं शब्द है उस को जो मिस्टर जोन बीम्स साहब फारसी आसमान آسمان होना अनुमान करते हैं उस से मैं बिलकुल असममत् हूं । मैं इस को सं० असमानं, त्रि० (नास्ति समानो यस्य ।) अतुल्यं, विजातीयं, सजातीयाभिचं, का वाचक समझता हूं अर्थात् ईस = परमेश्वर का; सीस = शिर; असमानं = अतुल्य है ।