पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३५६ लंपे जु राज कित्ती प्रवछ । लोह मरन हुल्लंत दिन ॥ पछ पंद राज पच्छै चढी । नाहरराउ नरिंद रन ॥ छं० ॥ १४८ ॥ दृ० ॥ ८० ॥ कवित्त ॥ नाहर राउ नरिंद । चित्त चिंता उत्तारिय ॥ मन वध्यौ घन घय्यौ । मरम केवल विचारिय ॥ सुनहूं तौ * कहूं कवित्त । सुथिर जीवन जग नांची ॥ एह संसार असार । सार कित्ती कलु मांची ॥ ज्यौं उरगए सुप उंदर परै । यौं सुदेस नाहर कधै ॥ सपनव्य बात भिक्षै नहीं । नाम एक जुग जुग रचै ॥ छं० ॥ १५० ॥ ६० ॥ ८१ ॥ दूहा ॥ दूप कपि रचि रन मंड रूपि । ज्यौं कपि रक्खस सेन ॥ कोपि कान्ह धायौ बली । ज्यौं अगि विकुठिय गेन ॥ छं० ॥ १५१ ॥ ६० ८२ ॥ कान्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥ विराज ॥ धप्प्यौ कान्ह घही। फुटी अंधिपही ॥ खरी सेन फही। मनौं दूध षही ॥ छं० ॥ १५२ षगंगे उछही । मनौं कठ कही । परे भूमि लही । मनौं मद जही ॥ छं० ॥ १५३ ॥ बद्दै पग्ग घही । मनौं चक्क मही । तरफैं कि नही । मनौं लागि नही ॥ छं० ॥ १५४ खरै यों सुभही । मनौं लौन नही । सुरैं मारि रूही । मनौं लत्त तही ॥ छं० ॥ १५५ ॥ पसू पंष ठही । पषं ओन चही । कषीचंद भही । मुषं कित्ति रही ॥ छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ८३ ॥ ८० पाठान्तर-प्रथीराज । गजि । उद्भार । भांन। गषन । मंडै । यु । रासि । कित्ति । सोई । पक्कै । नाहरराव ॥ ८१ पाठान्तर-नाहरराय । चिंत चिंता । उतारीय । केवलह । विचारीय । सुनहु । सुन हूं । * अधिक पाठ है । नांहीं । ज्यां । उरगह सुमुप । यों । सुमिट्टै । ८२ पाठान्तर-हनं । ज्यां । रंपस । कन्ह । ज्यो । विकुट्ठिय ॥ ८३ पाठान्तर-* सं० १६४७ की प्रति में शुद्ध नाम विराज है और इतर में छंद रसावला है ॥ १५२ ॥ मनं । कठ । परैं । मनौं । मनौ । मद ॥ १५३ ॥ बहै । मनं । तरफै । लाग ॥ १५४ ॥ लरैं । यों । मनं । लांन । मनं । लत ॥ १५५ ॥ पसूं । घट्टी । कवि ॥ १५६ ॥ १४